Wednesday, September 05, 2012



लूट रहा है देश को कोई 
कोई घर को तोड़ रहा 
कोई सत्ता में आने को 
सारे  नंबर जोड़ रहा 

कोई आरक्षण के वादे  
देकर वोट झटकता है  
कोई कुछ रंगों के झंडे 
बस हाथो में रखता है 

अपराधो की श्रखलाओ में 
सबको पीछे छोड़ चुका
सत्ता  के गलियारों से वो 
अपना सम्बन्ध जोड़ चुका 

ऐसी  पावन राजनीति का 
हुआ प्रदर्शन और कहा 
हमें गर्व है इस विश्व का 
सबसे बड़ा लोकतंत्र यहाँ 

कृते अंकेश 

Wednesday, August 29, 2012

कौरवो की सुन व्यथा 
यमराज भी रोने लगे
पांडवो की ध्रस्टता पर 
धैर्य वो खोने लगे
तुम सैंकड़ो और वो पांच थे 
फिर भी सदा लड़ते रहे
धर्म का इस कदर 
अपमान वो करते रहे
क्या हुआ  जो यदि 
राज्य  तुमने ले लिया
राजधर्म था यही 
जो  तुमने किया 
छल कपट तो सदा 
नीति राजधर्म है
एक नारी पांच नर
क्या यह सत्कर्म है 
 मत निराश हो पुत्र 
शेष हूँ मैं अभी 
न्याय धर्म और सत्य की 
आस  शेष है बची 

कृते अंकेश 

Sunday, August 26, 2012

मेरा जीवन रहा अकल्पित 
त्याग तपस्या रही अधूरी 
अधरों की मुस्कान अपरिचित
एक अनजान सी जीवन शेली 

मुझे रंग की चाह नहीं थी 
जीवन की परवाह नहीं थी 
स्वप्न अधूरे रहे छलकते 
विस्मृत नयनो से थे तकते

कृते अंकेश

Friday, August 24, 2012

 लगा मुझे ऐसा मानो तुम आये
और चले गए फिर बिना कुछ बताये 
बैठा था मन मेरा एकाकी 
खोया था जिसमे थी तुम्हारी झाकी 
बेबस था मन 
इसने सपने सजाये 
लगा इसे रंगों में तुम निखर आये 
छाया रही  उडती थी आँगन में दिन भर 
पंखो ने पकड़ी थी सपनो की सरगम 
मैंने न जाने कितने गीत गए 
लगा मुझे ऐसा मानो तुम आये 
और चले गए फिर बिना कुछ बताये 

कृते अंकेश




 लगा मुझे ऐसा मानो तुम आये
और चले गए फिर बिना कुछ बताये 
बैठा था मन मेरा एकाकी 
खोया था जिसमे थी तुम्हारी झाकी 
बेबस था मन 
इसने सपने सजाये 
लगा इसे रंगों में तुम निखर आये 
छाया रही  उडती थी आँगन में दिन भर 
पंखो ने पकड़ी थी सपनो की सरगम 
मैंने न जाने कितने गीत गए 
लगा मुझे ऐसा मानो तुम आये 
और चले गए फिर बिना कुछ बताये 

कृते अंकेश




Monday, August 20, 2012

था दर्द पिघलता आँखों से 
साँसे कर्जे में डूबी थी 
दाने दाने के मोहताज़ हुए 
तब लाशे  उनकी झूली थी 
तुम किसकी बातें करते हो 
है हुआ फायदा किसे यहाँ 
पिघला पिघला कर तन जनता का 
महलो में बस धन जमा किया 

कृते अंकेश 

Sunday, August 19, 2012

भारत जिसे हो कहते 
जो देश है हमारा 
सदियों से जिसने सबको 
बस है दिया सहारा 
कोई नहीं पराया 
यहाँ सब हुए है अपने 
सबने सजाये मिलकर 
जिसके थे जो भी सपने 

जो कर रहे है हिंसा 
इतिहास से बेखबर है 
पिघले अशोक जैसे 
भी दिल कभी इधर है 
शस्त्रों को यु तो हमने 
है नहीं कभी सराहा 
लेकिन मद में मादित 
आक्रामको को  छकाया

ओ मद में मादित मुसाफिर 
क्यों घर को ही तोड़ते हो 
चंद स्वार्थियो के बहकावे में 
इंसानियत छोड़ते हो
यह हिंद है तुम्हारा 
यह हिंद है हमारा 
आओ संभाले इसको 
हिंदोस्ता है प्यारा 

कृते अंकेश 

Thursday, August 09, 2012

चोरो की सेना ने सोचा 
चलो करे हम भी व्यापार
बिजनेस सबका फलता फूलता 
हम ही बैठे क्यों लाचार 

बड़े चोर ने पता लगाया 
क्या स्टेटस बिजनेस का 
शेयर मार्केट ठप पड़ी थी 
पता नहीं इन्वेस्टर का 

इन्फ्लेशन की मार झेलती
जनता पहले ही तंग थी
किसी नए प्रोडक्ट की सक्सेस
उम्मीदे बिलकुल कम थी

लेकिन देखा एक है तबका
रहा अभी भी हरा भरा
राजनीति का है गलियारा
सुख सुविधा संपन्न सजा

मौका पाकर चोरो ने फिर
सेंध लगा दी इसमें भी
राजनीति भी हुई सुसज्जित
पाकर स्किल चोरो की

कृते अंकेश

ओ सलोने सांवले तकते नयन तुझको यहाँ
बावरी है गोपिया है बावरा यह बृज हुआ 
ओ यशोदा लाल तेरी बासुरी बजती कहा 
है कहा वो नन्द का आँगन था खेला तू जहा 
ढूंढती अंखिया तुझे ही 
श्याम मेरे हो कहा 
देख तेरे ही तो स्वागत में सजा  है यह जहा 


"जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाये"

अंकेश 

Wednesday, August 08, 2012


प्रेम परिभाषित नहीं है 
प्रेम प्रस्तावित  नहीं 
प्रेम प्रेरित  भी नहीं है 
प्रेम पूरित  भी नहीं 

साध्य है या साधना 
आराध्य या आराधना 
हार  जीत या मधुर 
है कोई उपासना 

क्या  विरह का दंभ है 
या  मधुर संग है 
आसमा से या कटी 
बस कोई पतंग है 

रंग में न रूप में 
छाव में न धूप में 
यह मिला जब भी मिला 
बस प्रेम के ही रूप में 

कृते  अंकेश  

Tuesday, August 07, 2012


आलिंगनो में लुप्त व्यथा   
या मात्र  अश्लीलता   
परोक्ष  प्रतिकर्ष    
या अनुत्तरित निष्कर्ष   
या अपराजित प्रेम कथा 
संवेदना 
छद्म ही सही 
ढूंढती जीवन नया 
प्रयोजित स्वप्न 
वासना, दुर्भावना 
या निर्णय व्याकुल मन का 
प्रश्न संक्षिप्त  सा 


कृते अंकेश 
है रात जो यह  
ढलती ही नहीं 
आँखों से कभी 
छलकी ही नहीं 
हम  दूर सही 
मजबूर कही 
यादो की चुनर 
उडती ही रही 

जो खोये है 
पलकों मैं कही 
साँसों ने जिन्हें 
था नाम दिया 
सुबह भी उनका 
क़र्ज़ हुई 
जाने क्या था 
पैगाम लिया 

रुखसत होकर 
अब अश्को ने
आँखों से नाता 
तोड़ दिया 
कल तक थे जो 
फिर  पास  रहे   
आना जाना भी 
छोड़ दिया 

हमने फिर भी 
चुन चुन  करके 
सपनो की सेज 
सजा डाली 
ओ रात कहा अब 
तू यु चली 
हो बनी 
बावरी मतवाली 

कृते अंकेश 

Thursday, July 26, 2012


कुछ व्यक्ति मात्र को अपराधी घोषित करने से 
अपराध खत्म नहीं होते 
यह तो विक्षिप्तता मात्र है तंत्र की 
जो जन्म देता है विचारो को 
बहकाता है
उकसाता है 
पथ भ्रमित करता है 
उत्प्रेरित करता है 
तत्प्रेरित करता है 
और फिर छोड़ देता है भटकने के लिए  
लेकिन विचार कभी नहीं मरते 
अपराध ऐसे ख़त्म नहीं होते

अंकेश 

Sunday, July 22, 2012

They ask for moon
whether its far or near
they don't care
hunting souls
so determined
profound skills 
holy shrine 
to my surprise 
they even don't know how to climb

Ankesh



Thursday, July 19, 2012

आखिरी    उडान

बाबूमोशाई, एक आवाज़, जो आज भी कानो में गूजती हुई सजीव लगती है, आनंद, सिनेमा  का एक किरदार मात्र न होकर व्यक्तित्व का परिचायक हो गया, वो हसने का अंदाज़, जिसे दर्द की मानो भनक भी नहीं है और जो सत्य से डटकर सामना करने को तैयार है | अभिनय का वो निराला अंदाज़, जहा अभिनेता की पहचान उसके किरदारों से होने लगे, निसंदेह एक बेहतरीन अभिनेता की निशानियाँ है | आनंद का आनंद जहा जीवन से कभी नहीं हारता है तो अमर प्रेम का आनद एक हारे हुए जीवन को जीता है, लेकिन दोनों ही किरदार जीवन को सशक्त  रूप से जीने की एक बेहतरीन मिसाल देते है | स्वर बदलते गए,  लेकिन ह्रदय के भावो को चेहरे के अनुभावो मात्र से व्यक्त करने की प्रतिभा में निपुण   राजेश खन्ना अपने हर किरदार में एक नयी जान डालते चले गए | भारतीय सिनेमा जगत के प्रथम महानायक का सम्मान उन्हें उनकी इसी प्रतिभा के फलस्वरूप मिला | सिनेमा जगत एवं दर्शक जगत उनके इस योगदान का सदेव ऋणी रहेगा |

Wednesday, July 11, 2012

रात अँधेरी, पिया वावरा मेघ मचलते बरसो न
सूखे सूखे सदिया बीती  शुष्क  अधर  है  बरसो न
उन्मादों  के  आवाहन  से  जूझ   रही  यह काया  है
इस  काया के अंतरगों में शामिल होकर बरसो न

चली निशा है क्या ढूँढने, जीवन का रंगमंच सजा
प्यासी  काया, प्यासा जीवन, प्यासा ही अंतर्मन यहाँ
इस विदग्ध  प्यास से मुझको तृप्त कराते बरसो न
इस काया के अंतरगों में शामिल होकर बरसो न

तेरी वाणी, तेरी छवि या तेरी ही मुस्कान यहाँ
तेरे ही इन भाव बिभावो  में खोया जीवन है यहाँ
इस जीवन को  विरह भाव से मुक्त कराते बरसो न
इस काया के अंतरगों में शामिल होकर बरसो न

मेरा क्या उन्माद हूँ पल का, पल में  ही मिट जाऊँगा
लेकिन इस पल के रहते में गीत मिलन के गाऊँगा
तुम भी  मेरी मुस्कानों  में मुस्काने भर  बरसो न
इस काया के अंतरगों में शामिल होकर बरसो न

कृते अंकेश

Tuesday, July 10, 2012

नारी स्वर 

घूँघट में बंद रखते हो
आँखों को नीचा करते हो
साँसों पर सीमा कसते हो
फिर कहते हो साथ चलो
पहले चलने का अधिकार तो दो

सीमित सपनो का अस्तर है 
 बिछी हुई चारपाई है
क्या इस  जीवन की परिधि
बस शादी और सगाई है
यह  भी है काया मानव की
इसको स्वतंत्र संसार तो दो
फिर कहते हो साथ चलो
पहले चलने का अधिकार तो दो

न चिंतित हो मेरे कल को लेकर
मेरा कल मेरा सपना होगा
मेरी अभिलाषा बस इतनी
मुझको सपने रचने की हिम्मत देना
है पाला नन्हे तन को बरसो मैंने
अब नन्हे मन को पलने का अधिकार तो दो
फिर कहते हो साथ चलो
पहले चलने का अधिकार तो दो

क्यों वस्त्रो की सीमा तन  पर
क्यों शील का है प्रतिबन्ध यहाँ
क्या कभी किसी पुरुष ने भी
इतना है  उपहास सहा
इस चरित्र  के चित्रण में
पहले उचित मानको को स्थान तो दो
फिर कहते हो साथ चलो
पहले चलने का अधिकार तो दो

 है नहीं यह सीमित तन और मन
हर क्षेत्र को इसने खखोला है
जीवन के हर स्तर को
अपनी गुणवत्ता से तौला है 
इस जीवन को भी स्वतंत्र बन
पथ विकास  पर चलने का अधिकार तो दो
फिर कहते हो साथ चलो
पहले चलने का अधिकार तो दो

कृते अंकेश

Sunday, July 08, 2012

हसरतो का क्या
वो तो तमन्नाये है दिल की
बन बेआवरू उमड़ेगी हर पल हर घडी
उम्र के बेवाक पल और जीवन का यह मोड़
बहकायेगा हजारो बार
मन करेगा उतर जाने को समुद्र में
और जाने को लहरों के पार
हिमाद्राक्षित चोटिया नजर आएँगी नजदीक
जो हो सकती है मीलो दूर कही उस पार
पर नहीं है गलत इनमे से कुछ कर गुजरना
क्यूंकि वक़्त भी नहीं आएगा यह बार बार

कृते अंकेश

Friday, July 06, 2012

जाग्रत मन 
या सुप्त तन 
रात के इस प्रहर  में विलुप्त जीवन 
ख़ामोशी 
गहन ख़ामोशी 
अवरुद्ध करती अंतर्मन 
कैसा प्रयत्न 
खोजते क्या नयन 
जाग्रत मन 
या सुप्त तन 
रात के इस प्रहर में विलुप्त जीवन 
मधुर करुण क्रंदन विषाद 
कैसा है नाद 
ओ खामोश व्योम 
है कौन पास 
करते हो किसका इंतज़ार 
है दूर किरण 
जाग्रत मन 
या सुप्त तन 
रात के इस प्रहर में विलुप्त जीवन 

कृते अंकेश 
 

Thursday, July 05, 2012

मेरा स्वप्न 
है एक नयी दुनिया 
सीमाओ से परे 
जहा मनुष्य बेफिक्र विचरण करे 
लेकिन 
नहीं है साधन अभी मेरे पास
इसलिए अभी बस लिखता हूँ 

कृते अंकेश 

Wednesday, July 04, 2012

मौत की परवाह हमने कब की है मगर
एक जिंदगी तेरे लिए ही  जीकर भी जायेंगे

कृते अंकेश

Sunday, July 01, 2012

किसका स्वागत करती रहती
है चंचल मुस्कान तुम्हारी
किन अधरों को जाकर तरती
है चंचल मुस्कान तुम्हारी
किन स्वप्नों में जीवन भरती
है चंचल मुस्कान तुम्हारी
किन अंखियो में जाकर हसती
है चंचल मुस्कान तुम्हारी

छूकर जाती मेरे मन को
है चंचल मुस्कान तुम्हारी
विस्मृत कर जाती नैनों को 
है चंचल मुस्कान तुम्हारी
आभादीप्ति बन चेहरे पर  इतराती
है चंचल मुस्कान तुम्हारी
मेरे जीवन में घर कर जाती
है चंचल मुस्कान तुम्हारी

कृते अंकेश

Friday, June 29, 2012

तुम चिल्लाया करते हो भूख भूख
हो कम्युनिस्ट क्या चाहते हो

भोले भाले मजदूरों को
क्यों ज्ञान का पाठ सिखाते हो

देखो पैसे की महिमा को
समझो जानो फिर बात करो

मर जाओगे यु ही भूखे
न तंग यहाँ  हालात करो

हमको तो मिली है विरासत मैं
यह लूट की आदत जेनेटिक

न उलझो हमसे व्यर्थ यहाँ
यह सिस्टम  है पूरा  सेप्टिक 

कृते  अंकेश 

Tuesday, June 26, 2012

हवा के झोको ने  पूछा महल के वीरानो से
क्या आता जाता है कोई
इन बंद दरवाजो से
खिडकिया है  खुली  शायद   
कोई  झोका कभी  आया
नहीं दिखता  मगर    चेहरा
 पानी बारिश ने है फेलाया    
रंग  भी है  पड़े फीके
उखड़ती पपडिया चीखे
रौशनी की किसे सुध है
ख़ामोशी ने दिल बहलाया
हवा के झोको ने  पूछा महल के वीरानो से
क्या आता जाता है कोई
इन बंद दरवाजो से

कृते अंकेश

Friday, June 22, 2012

Have u ever seen the air moving high and high
known as wind when it flies
people say it takes
the warmth of earth
to spread it
all across the world
Those who are in love
may hope for a rain
as it gives a chance
to go insane
but those who are  secluded

from the worldly desires
may find it irritating
bringing back the fire

To my surprise
Its just a matter
which somehow can make
everyone's life better.




Ankesh

 

Wednesday, June 20, 2012

कुछ भी शेष नहीं उसका मेरे पास 
मेरे सिवा 

अंकेश

Wednesday, June 13, 2012

स्वर थे अनजान
न कुछ पहचान
न लय, न सुर, न ताल
अनकहे सवाल
व्यर्थ का  ववाल
पुकारता यह  मन
चला जा अपनी धुन
उत्श्रंखल बासुरी
सदा यु ही बजी
उर्वशी कहो
कहा को तुम चली
ढूढ़ते है मेघ
हृदय के राग को
छिपे हुए कही
किसी चिराग को
स्वप्न में भी जो
रहा सदा  है मौन
 जानते हो  क्या
भला वह है कौन ?

अंकेश

Sunday, June 10, 2012

मेने स्वरों को तोड़ कर
अपनी लयो  को छोड़ कर
जीना था सीखा फिर कही 
तेरी नज़र से  जोड़ कर
रंगों की वो  महफ़िल नयी
थी शाम भी कुछ अनकही
रिश्ते नए बनते गए
बस साथ हम  चलते गए

अंकेश
यदि नहीं बन पाए जीवन
जैसा तुमने सोचा था
अपना लेना सत्य मान कर
वरना शोक इसे सस्ता कर देगा

अंकेश

Friday, June 08, 2012

सूक्ष्मता 
इतनी विरल 
जटिलता या सरल 
गहन गूढ़ चितन में लुप्त मन अविरल 
प्रश्न यह निश्चल 
जीवंत मुखर तरल 
अनुत्तरित प्रस्तावना सकल 
चाहे आज या कल 
समय चंचल  
चल दो कदम तो चल 

अंकेश 
आखिरी थी बूँद जो 
उड़ गयी वह भी लो 
रक्त क्या नसों में अब न जल रहा 
पर तुम तो सबसे बेखबर 
देखते न एक नज़र 
तुमको क्या पता यहाँ क्या चल रहा 

Thursday, June 07, 2012

विकास या बकवास
क्या है मिला हमें
जब जब बोला कुछ
बता दिए अर्थशास्त्र के जटिल शब्द
कीमतों का जाल
रुपये का हाल
गरीब की खाल
भला किसको है इनका ख्याल 
आप तो रहते हो
सपनो के महल में
मेरे आकाश में तो तपता सूरज है
बारिशे बहा ले जाती है मेरा समेटा हुआ घर
फिर पूछते हो मुझे क्या चुभन है
में तो जीता हूँ उम्मीदों से
की आने वाले पल में कभी तो हसूंगा 
आप मौका ही नहीं देते
में निस्वर हूँ
आपके राष्ट्र का एक सामान्य नागरिक

अंकेश

Saturday, June 02, 2012

तुम क्यों उदास हो
देखो उस छोटे बच्चे को
जो पल भर पहले भूख से रोता था
तितली को देखकर किस तरह हस रहा है
जाने उन पंखो में ऐसा  क्या जादू है
उड़ा ले गयी पल भर में एक उदास मन को
और छोड़ गयी बस एक नादान बचपन

अंकेश

Tuesday, May 29, 2012

Commit the SIN and take the SHOWER

Life is full of surprises, every next moment of it can be a wonder, a nightmare or an usual second. It starts from a bed, ends to a bed and during the course goes through a number of beds, some of them are comfortable, some are not, but each one of them leaves an impression which is long lasting. Most of us takes the life as it comes to us unaware of its right and wrong. In true sense, saying something as right and wrong is very  vague and most of the time is limited by the extent of our knowledge. So it is highly probable to do wrong things and many times without even knowing it. But then committing the sin should not be such a serious issue as most of the times its an outcome of a probabilistic decision among the random choices which life offers to you. In fact a sin is not a sin until you realizes that you have committed the sin and this is the reason why people says, "Ignorance is the bliss". But even realization of committing such a sin does not make you a sinner unless you yourself endorse it. In fact its always a good choice to go and take a shower and hope that water will take away all the sin and make your soul clean. Random problems can have only random solutions and its not something new... the idea is well advertised and proclaimed in mythology too.. taking a dip in the holy river of ganga is no different from taking a shower, the true holiness comes from the realization and not the water. The ganga flows in every shower if you can realize it.

Wednesday, May 23, 2012

विषयों का आस्वादन हो 
लेकिन न हो जीवन की लय 
नहीं चाहिए देव मुझे 
खुशियों का ऐसा परिचय 
विभा कही हो पथिक कही हो 
सुगम  मार्ग हो रहा विरल 
दे देना इससे बेहतर तो 
पथ कोई मुझको दुष्कर 
क्षणिक रहे आभास कोई 
जीवन के इस संग्राम में  जो 
उचित ही होगा रहू  अपिरिचित 
नहीं सरल की चाह मुझे 
या कितनी ही व्याधि हो 
अथवा मार्ग हो रहा विकल 
बस देना मुझको इतनी शक्ति 
रहू  निर्णयों पर सदा अटल 

कृते अंकेश  


Monday, May 21, 2012

सत्यमेव जयते, समाज की जटिल समस्याओ को सिनेपटल के माध्यम से उठाने का एक बेहद सराहनीय प्रयास, धारावाहिक  के नवीनतम  अंक  में  दहेज़ की समस्या को दर्शाया गया हैं| दहेज़ कम  से कम भारतवर्ष के लिए एक नया शब्द नहीं है, यह कुरीति समाज में एक अरसे से विद्यमान है और ऐसा नहीं है की इस समस्या को उठाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया | बचपन में एक कहानी पड़ी थी जहा विवाहिता का भाई जब उसको सावन के महीने में बुलाने के लिए जाता है तो वहा  उसको काफी बेईज्ज़ती  सहनी पड़ती है |  उसको ताने दिए जाते है कि तुमने अपनी बहिन को कुछ दिया भी या ऐसे ही कोरी शादी कर डाली | बेचारा भाई सब कुछ सुनकर उनकी मांगो को मानने को तैयार हो जाता है, लेकिन विवाहिता की सास यह कहकर उसे लौटने को कहती है की पहले हमारी मांगे पूरी करो तब बहिन को लेकर जाना | भाई जाने ही वाला था,  कि सामने से अपने जीजाजी को आते हुए देखा, वह कुछ उदास दिखते थे| सास मन में  शंकित होकर पूछती है ... पूजा कहा है? .... अकेले क्यों आ गया?... जीजाजी दुखी होकर बोले.... उन्होंने कहा है पहले हमारी कही हुई चीज़े भेजो,  फिर लड़की को लेकर जाना.... चंद शब्दों में कहानी काफी कुछ कह जाती है, कहानी का सार था .... क्यों हम  भूल जाते है कि जो हमारे लिए कष्ठदायक   है वह दूसरो के लिए भी कष्ठदायक  होगा .... लेकिन दुर्भाग्य आज भी यह कुरीति समाज में विद्यमान है |

शिक्षा  एवं आत्मनिर्भरता इस समस्या से निबटने का एक महत्वपूर्ण साधन हो सकता  है | लेकिन नेतिक मूल्यों के बिना  इस लक्ष्य को प्राप्त करना उतना आसान नहीं है | अतएव मेरा व्यक्तिगत मत है कि इस समस्या से निबटने के लिए युवा वर्ग को जाग्रत करना सर्वश्रेष्ठ   विकल्प है | जिसमे शायद आमिर  जी का यह प्रयास  मददगार साबित होगा | 

Sunday, May 13, 2012

हुई रात मेरे तात भी आते 
देखो पंक्षी घर को जाते 
छोड़ो हाथ मुझे जाना है 
वापिस कल भी तो आना है 

अभी कहा है चाँद भी निकला 
रवि किरणों का रंग न बदला 
क्या है जल्दी कहा है जाना 
बना रहे हो व्यर्थ बहाना 

देखो रात घनी है घिरती 
तुमको सूझ रही बस मस्ती 
छाए मेघ है भींग न जाना  
 ऊपर से है पथ अनजाना

नहीं मिलेगा ऐसा मौका
छलकेगा जल जब अम्बर का 
तेरे चेहरे से मोती बनके 
उसका मुझको दर्श है पाना 

क्या है जल्दी कहा है जाना 
बना रहे हो व्यर्थ बहाना ।।


कृते अंकेश   
माँ मेरा परिचय तुमसे है 
में तो अंश तुम्हारा हूँ 
तुमने सिखलाया जिनको चलना 
उन कदमो से बढता आया हूँ
तेरी ममता की छाव सदा 
मेरा श्रृंगार रही हरदम 
इस जीवन की हर अभिलाषा 
तेरे कदमो में है अर्पण 

अंकेश 

Wednesday, May 09, 2012


ब्यूटी इन द एज ऑफ़ करप्सन 

इतनी सुन्दरता को कैसे एक चेहरे में ढाला होगा
शक है मुझको इसमें भी हुआ कोई घोटाला होगा

अंकेश 

Tuesday, May 01, 2012

है अप्रतिम सौंदर्य तुम्हारा
मानता हूँ इसके सम्मुख में यहाँ हारा

कर दिया खुद को समर्पित मैंने यहाँ कब का प्रिये
अब तो बस हूँ मुस्कुराता आस एक मन में लिए

शायद कभी निर्णय करोगे
तुम इस दिन और रात का
है पला जो ख्वाब दिल में
उस मुलाक़ात का

है अप्रतिम सौंदर्य तुम्हारा
मानता हूँ इसके सम्मुख में यहाँ हारा

मानता हूँ सौंदर्य में  तुम श्रेष्ठ हो   जग में प्रिये
में भी नहीं लेकिन बुरा हूँ
उस रात के स्वागत के लिए
तेरी विभा में जब लगेगा इंदु भी बस मात्र तारा
मानता हूँ इसके सम्मुख में यहाँ हारा

है अप्रतिम सौंदर्य तुम्हारा

क्या उडोगे साथ मेरे बनके पक्षी इस गगन में
है सदा से थी रही जो, आरजू  मेरे इस मन में
जानते हो उचाईयों से भी नहीं अब तक में हारा
है अप्रतिम सौंदर्य तुम्हारा
मानता हूँ इसके सम्मुख में यहाँ हारा

अंकेश

Sunday, April 29, 2012

यमुना तेरे तट पर लिखी कितनी कहानी है
कितने शहर बसते यहाँ कितनी रुवानी है
आँखों में है रहती  चमक सजती  जवानी है
हाय मगर क्यों खो रहा तेरा यह पानी है

थी कृष्ण की कालिंदी तू थी  सूर का बचपन
तेरे ही तट पर थी रुकी मुगलों की हर धड़कन
ग़ालिब ने की थी शायरी तेरे ही सायो  में
थी ली  भगत ने भी  पनाह तेरी ही बाहों में

तेरे किनारों पर  लगे कितने यहाँ  मेले
तेरे तटों पर न  जाने कितने वीर थे खेले
तेरे सहारे ही हुई विकसित यह सभ्यता
हाय मगर क्यों भूली आज यह तेरी महत्ता

संभलो संभालो आज यह अपनी निशानी है
अपनी रगों में दोड़ता इसका ही पानी है
आँखों में है रहती  चमक सजती  जवानी है
हाय मगर क्यों खो रहा तेरा यह पानी है

अंकेश

Wednesday, April 18, 2012

मैं सैयां के साथ चली जाऊंगी तकते रहना
मैं बापस न आऊँगी बस नाम ही जपते रहना 

मैं जो चली जाऊंगी 
फिर न मैं यु आऊँगी 
कह दो जो कहना है मुझसे 
दिल  मैं भी  क्या  रखना 
आँखों  में क्यों  रहे छुपा तुम 
देखा है जो सपना 
सपनो को अपनाऊंगी 
पर जो गयी न आऊँगी    
 
मैं सैयां के साथ चली जाऊंगी तकते रहना
मैं बापस न आऊँगी बस नाम ही जपते रहना
  
तेरी बातें मेरे दिल के समझ नहीं आती है 
जो तू सब कुछ जानती  है तो 
फिर क्यों तडपाती है
आँखों  में तस्वीर तुम्हारी 
सपनो में है चेहरा 
तुझको लेने  आऊँगा में 
बांधके सर पर सेहरा 
लेकर तुझे   जाऊँगा 
सपनो सा  सजाऊँगा 

मैं सैयां के साथ चली जाऊंगी तकते रहना
मैं बापस न आऊँगी बस नाम ही जपते रहना
    

  कृते अंकेश

Wednesday, April 11, 2012

तितलियों की किसे फिक्र है यहाँ
 उनकी उड़ानों को तो देखा भी न  गया
माली ब्यस्त है ख़ुशबुओ का सौदा करने मैं
तितलियों  को तो  सोचा ही नहीं गया

पंखो को फडफड़ाती  रही यहाँ से वहा
कुछ ने उनके सौन्दर्य को निहारा तो
पर उसके आगे कुछ भी न हुआ  ....
तितलिया भी खो ही गयी फिर
बगीचों में कही .....

अंकेश
रात पिघलती गयी
चाँद खोता रहा
जुगनुओ की भीड़ में अँधेरा सोता रहा
मैंने इंतज़ार किया
ओस की बूंदों के गिरने तक
उषा की किरणे आयी
पर तुम नहीं आये....


मैंने भी पाया था
चाँद को ढलते हुए
रात के आगोश में खुद को पिघलते हुए
लेकिन अँधेरा मुझे डराता रहा
यकीन मानो
इंतज़ार मैंने भी किया
बस मुझे ओस की बूंदों का पानी नज़र न आ सका
और फिर आ गयी उषा की किरणे
मिलन की एक आस लेकर

कृते अंकेश 


 
 
यह तस्वीरे जो दिखती है 
हकीकत की परश्तिश की 
यह किस्मत की है जंजीरे 
कभी उलझी कभी सुलझी 

नहीं पर मिल सकी है यह   
हकीकत बस इबादत से
लहू के रंग से सजती 
यहाँ सच की  नुमाइश है 

कृते अंकेश  

Tuesday, April 03, 2012

हैं पथ में अगणित बाधा तो क्या
रुकना तेरी पहचान नहीं
 बस बढे चलो जीवन पथ पर
मंजिल होती हर आसान नहीं

अंधियारे के बाद सदा
रवि की किरणे भी आती है
क्या हुआ रही बाधाये विकल 
 हर मुश्किल हल हो जाती है


जो रहे यहाँ उलझन में सदा
या सुप्त रहे वह छूट गए
मिलता बस  पल भर का मौका
सपने रचते या टूट गए

लेकिन यह मनु की संतान यहाँ
कब इसने हार ही मानी है
हो  दुर्गम पथ बाधाये विकल 
पायी मंजिल जो ठानी है 

कृते अंकेश

 

Saturday, March 31, 2012

Emily was just one year old when her mother passed away. Since then only I have taken care of her. By now she hardly remember anything about her. Days are passing away, and she is becoming more and more intelligent. To my surprise she started speaking just at the age of one and half year and the first word which came out of her was "Ma", though she has not much cared about it and very soon she started speaking lot other words. My most of the time either goes in office or in interpreting the incomplete sentences of my sweet angel emily. But she was a sharp girl and in a short duration she has started speaking clearly and complete sentences...

Time goes very fast when you start enjoying the life or things are moving well.... Emily has become 5 year old and she has became friend with many other children of her age, they used to play together in the evening. And once I came back from office, she use to narrate me everything whatever has happened that day... She used to be angry when someone cheated in game and expression of disappointment can be clearly seen on her face while listening to her daylong summary of event.

Winter has come and snow was predicted this year. Still I have made a plan to go out for a movie with Emily as her favorite cartoon movie has been released. Its a long time since I have gone out, in fact I never felt the desire to go, office and Emily were the only two things for which I cared much. We were going by a car and there was not much traffic on the road. suddenly I realized that an iron bar struck on glass window of my car, and before I could think anything somebody pulled me out of my car . I couldn't resist them as my eyes were constant looking for Emily but I was not able to find her. They were shouting furiously among each other and then they left me there only and started searching someone else. I was injured, tired, shocked, puzzled but my eyes were constantly looking for my Emily. Then suddenly I noticed a beggar lady standing on the other end of the road and there was my Emily pulling the skirt of that lady and asking " Ma, see that monkey wanna play with us, will you come or shall I go alone............  so it all happened for you... oh my beloved daughter...

Ankesh Jain

Monday, March 26, 2012

 मूल रचना - फोरौघ फरोख्जाद
अनुवादक - अंकेश जैन

समय के धुधलेपन से दूर कही
एक भीडभाड भरी गली है
जिसके नुक्कड़ हमेशा भरे रहते है
अनेको युवको से एवं असभ्य लडको से
जिनके एकमात्र मनोरंजन का साधन कभी में ही हुआ करती थी

वह आज भी उन्ही गलियों तक सीमित है
अपने उन्ही बिखरे हुए बालो के साथ
और पतले दुबले शरीर को समेटे
उन्ही नुक्कड़ो के बीच

और वह अभी भी सोच रहे है
उसी छोटी लड़की के बारे में
जो बहुत पहले ही एक दिन ओझल हो चुकी है
इन हवाओ के बीच


 

Saturday, March 24, 2012

ओ रे सैयां तोरे  बिना
जागी रही मोरी अखियाँ
ओ रे सैयां तोरे  बिना
जागी रही मोरी अखियाँ
ओ रे सैयां

शाम होने लगी ओझल
रात ने ली है करवट बदल

तारे ओढ़े हुए चांदनी
है फिजा में घुली रागिनी
कहा हो तुम
कहा हो तुम
कैसे ढूढु तुझे इस तरह
ओ रे सैयां तोरे  बिना
जागी रही मोरी अखियाँ
 ओ रे सैयां   


है निशा भी कही ढल रही
है  फिजा भी बदल सी रही
कही गुमसुम, मगर फिर हम
दूंढ़े तुझको ही बस  इस तरह   
ओ रे सैयां तोरे  बिना
जागी रही मोरी अखियाँ

 ओ रे सैयां   


भोर की भी है आहट हुई
या है यह शरारत कोई
मगर तुझ बिन मेरे हमदम
नहीं जीने में है कुछ मज़ा
ओ रे सैयां तोरे  बिना
जागी रही मोरी अखियाँ

 ओ रे सैयां   ...............


कृते अंकेश 

Saturday, March 17, 2012

तितलिया है बनी उड़ने को ही सदा
क्यु है रोका उन्हें तुमने फिर इस तरह
यह किताबे यहाँ अब पुरानी हुई
इनके बोझो तले बस उड़ाने दबी
छोड़ो यह सिलसिला
खेल हो कुछ नया
न कोई रोक हो, न कोई टोक हो
जो जहा तक उड़े
उसकी मंजिल बने
पंखो पर यहाँ
कोई प्रतिबन्ध न लगे
देखना बस तुम
भटके न कोई
बाकी तितलिया तो बस उड़ने को ही बनी

कृते अंकेश 


 
 

Friday, March 16, 2012

ओ नन्हे से फूल
कभी क्या तुमने माली को देखा है
मिट्टी से सने हुए  हाथो से जो  बीजों को बोता है
सूरज की किरणों में तपती वह देह पिघल सी जाती है
उन श्रम की बूंदों से ही तुझमे तब सुन्दरता  आती   है
अपने जीवन को खोकर  भी जो तेरा  जीवन पिरोता है
ओ नन्हे से फूल
कभी क्या तुमने माली को देखा है
जीता है जो  इस आशा में
एक सुन्दर सा फूल खिले
खोता है अपनी साँसों को
तुझको स्नेह कुछ  और मिले
बस यह छोटा सा ही सपना
वह अपने जीवन में सजता है
ओ नन्हे से फूल
कभी क्या तुमने माली को देखा है
   
कृते अंकेश  

 

  

Thursday, March 15, 2012

अश्को में गुजारी तो क्या गुजारी ज़िन्दगी
जीकर भी रहे गुमसुम न सवारी ज़िन्दगी

आँखों में लेकर दिल की गहराइयाँ डूबे
चोट खाई तो क्या है प्यारी ज़िन्दगी

रंगों के यहाँ मौसम करवट बदलते रहते
जो साथ थे कभी, वो पास भी न होते

जिन आँखों में थी कभी उतारी ज़िन्दगी
अब ढूँढ़ते है उनको वो हमारी ज़िन्दगी

अश्को में गुजारी तो क्या गुजारी ज़िन्दगी
जीकर भी रहे गुमसुम न सवारी ज़िन्दगी

यु भूलकर किसी को चेहरे कहा बदलते
एक मोड़ पर बन जब  अजनबी से है मिलते

मेघो ने लगता  जैसे कोई रागिनी हो गायी
सारी नमी हवा की पलकों में घिर हो छायी

अब तो लगे की जैसे तुम्हारी है ज़िन्दगी
जीकर भी रहे गुमसुम न सवारी ज़िन्दगी  
 
कृते अंकेश

Sunday, March 11, 2012

The garden is dying
and I am worried

Its a dream of my father
and he really worked hard for it
He is an intelligent and great guy 
he made it beautiful with all his sweat
But now as the years are passing
he is becoming old
and he is no longer getting enough time to take care of it

My mother knows how to pray
but by now she has enough to say
the flowers in the garden are vanishing everday
she still believes
that the god is there
to listen all her pray

My brother knows that the garden will surely die
He tried hard to convince everyone that we should take the dead plants out
but who can give his or her dreams
which since so many years altogether they have seen
my brother has became tired
he has forgotten the way
which once leads to the garden
now going away
clumsy lights of the bar
has seen him sometime in despair somewhere far

and I do not know what to do
I wish I could see those dreams
I could get enough intelligence
and courage to work hard
I know my mother is constantly praying
My brother lets try with the seeds of hope
hope, hope, seeds of  hope


written by Ankesh ( Inspired from a persian poem)

 


Friday, March 09, 2012

उन्मुक्त हूँ मैं
देखना उड़ जाऊँगा एक दिन
इन बन्धनों से
नहीं बाँध सकेंगे यह पिंज़रे मुझे
मेरी कल्पनाये
मुझे ले जाएँगी दूर
मेरी मंजिलो तक
आभारी हूँ तुम्हारा
जो तुमने दिया सहारा
पर चलना होगा मुझको फिर से
पाने   नया किनारा
उन्मुक्त हूँ मैं
देखना उड़ जाऊँगा एक दिन
 
प्रयत्न करूंगा
अंतिम साँसों तक प्रयत्न करूंगा
अथवा आने दो उस मृत्यु को
उसको भी आलिंगनबद्ध करूंगा
लेकिन नहीं बंधन में  रहने वाला
 उन्मुक्त हूँ में
देखना उड़ जाऊँगा एक दिन  

 श्रंगार, वियोग, हास्य, जुगुप्सा
जीवन मेरा स्पष्ट अश्रु सा
जो लगा अनुचित
उसको पल भर में छोड़ा

शेष रहा जो कुछ भी थोडा
बस उसको जीवन से जोड़ा
लेकिन शायद अपराधी हूँ में
जो यह बंधन तोड़ जाऊँगा
उन्मुक्त हूँ में
देखना उड़ जाऊँगा एक दिन

कृते अंकेश
   
 
 

Wednesday, March 07, 2012

हाँ में एक चित्रकार हूँ
रंगों से खेलता हूँ

कभी कभी कैद कर लेता हूँ अपनी भावनाओ को इन रंगों में
सोचता हूँ की शायद कभी सजाने के बहाने ही ले जाओगे तुम  इन चित्रों को
और सुनोगे गीत मेरे अन्तर्मन के इन चित्रों में
जब पाओगे खुद को अकेला

हाँ
सच ही तो है
बस सपना ही तो देखता हूँ मैं
क्योंकि जानता हूँ में कि
मेरे चित्रों में जीवन ही कहा है

हाँ पता है मुझे
मेरे चित्रों के सागर मैं
कोई भी मछली नहीं तैरती

कृते अंकेश   

Thursday, March 01, 2012

हो रहा हो घना जब अँधेरा कही
देखना रौशनी आएगी फिर कोई
रास्ते भी सदा मिलते सीधे नहीं
राहे मुडती यहाँ  मंजिलो से कभी

होसला फिर मगर तुम न खोना कही
मंजिले है कठिन पर मुश्किल नहीं
सीखना ठोकरों से उठना यहाँ
रास्ता यु सदा होता आसान कहा

वक़्त के यह पहर बस गुज़र जायेंगे
तुम चलते रहो  पल नए आयंगे
 जीत से भी कही फिर  मुलाक़ात होगी
देखना उस दिन बस तुम्हारी बात होगी 
   
 कृते अंकेश
 



Sunday, February 26, 2012

इश्क में जलना कहा, मिटना कहा, होता कहा
 इश्क तो दरिया है वो, जिसमे जब बहा, खुलकर बहा
है कहा फिर इश्क वो जो, तोड़ दे दिल को अगर,
इश्क तो होता वही, जो होकर जुदा भी दिल में रहा

कृते अंकेश 

Thursday, February 23, 2012

ओ नटखट गिलहरी
तुमको जितना बादाम खाना है उतना खाओ
चाहो तो सारे के सारे मुह में भर के ले जाओ
पर संभल के
तुम जब उस तार पर चढ़ती हो
तो तार के साथ साथ खुद भी झूलती हो
कही गिर न जाना
और फिर ऐसा न हो की
चोट लगने पर महीने भर मिलने ही न आना        
सच  में तुम कितना सुन्दर लगती हो
जब सारे बादाम मुह में भर लेती हो
अपने नन्हे   पैरो पर खड़े  होकर
हाथो में  पकडे हुए बादामो को खाते हुए तुम्हारा चेहरा
सचमुच कितना मासूम लगता है
मुझे तो डर है कि कही तुम मोटी न हो जाओ
और फिर इतनी ऊपर तक चढ़कर मेरी खिड़की में आ ही नहीं पाओ
चलो कोई नहीं
तुम आवाज़ लगा दिया करना 
मैं ही तुमसे मिलने आ जाऊँगा  

लेकिन कोई शरारत न करना
ओ नटखट गिलहरी 

कृते अंकेश

Wednesday, February 22, 2012

This is a beautiful poem "The address" written by "Sohrab Sepehri" . I have gave a try to translate it in hindi from its english translation. I have changed some part to make it in rhyme but tried to keep the essence same. Hope I have done my job satisfactorily.

Writer - Sohrab Sepheri
Translator in Hindi - Ankesh Jain 

क्या बता सकते मुझे हो
है कहा मेरा प्रिये
देख उषा की किरण को
पूछता व्याकुल हुए

सुनते ही यह बात मेरी
 मौन हो गया आसमा
शोकमय बादल घिरे
और टूटता तारा वहा

राही ने भी छोड़ दी
हाथो से अपने वो छड़ी
जिसके सहारे था चला
अब रेत में धूमिल पड़ी




फिर अचानक से किसी ने
कोई उत्तर था दिया

"देखते हो दूर क्या तुम
पेड़ वो अडिग सा रहा
ठीक उसके ही पहले
रास्ता एक जायेगा
होगा हरियाली से भरा
स्वर्ग जैसा ही नज़र आएगा
सुख और प्रेम की वहा
कोई भी न कमी होगी

देख जो तुम सके यदि

अच्छा फिर चले जाना वही
सीधे उसी पथ पर
पहुच जाओगे तुम कही
एक सुन्दर बगीचे पर
भावो से होगा यह भरा
जीवन वहा विश्रांत होगा
देखना फिर वही कही
एक झील का किनारा शांत होगा
ध्यान से सुनना वहा
पत्तियों के स्वर निराले
देखना मग्न होकर
बह रहे फब्बारे प्यारे
बहते है जो प्राचीनता के
असंख्य रहस्यों से
डूब जाना उन स्वरों में
जब तक नहीं कोई भय लगे

जब कोई शोर फिर
आकाश में हो बिखरता
पाओगे तुम वही कही
एक  पेड़ पर छोटा सा बच्चा
पास ही एक घोसले को
रहा होगा वो निहारता
स्वर्ण के अन्डो की आशा में
समय अपना गुजारता

देख जो तुम सको यदि

इतना मुझ पर विश्वास करना
उस बच्चे से बात करना
वह अबोध है वह सच्चा है
वही तुम्हे राह दिखायेगा

यदि
तुमने
सच में मुझसे अपनी प्रिये का पता पुछा है यदि !!!

  

   
  

Tuesday, February 21, 2012

अगर चाहू तो में उस पर्वत श्रखला की चोटियों पर भी जा सकता हूँ
मेरे जोश और उन्माद के पंख पूर्ण रूप से परिपक्व हैं
मैं अँधेरे मैं भी देख सकता हूँ
मेरे अन्दर का साहस रौशनी बनकर सदा मेरे साथ खड़ा है
 
मैं सागर की समस्त उर्जा को अपने में समेटे हुए हूँ
मैं रेत की तरह कही भी उड़ सकता  हूँ
जीवन का सौन्दर्य आज मेरी ताकत है
ख़ुशी , हसी , व्याकुलता, चंचलता , सहजता , सरलता सभी कुछ तो है मेरे पास
फिर भी मैं कितना अकेला हूँ

कृते अंकेश 
 

Sunday, February 19, 2012

गद्य बनाम पद्य


मन की अभिव्यक्तियों को पद्य के माध्यम से उकेरना अत्यत्न सरल है, पद्य मन के भावो को बड़ी ही सहजता के साथ व्यक्त करते चले जाते है। वस्तुत: कवि के लिए पद्य स्वभाभिक होते है। जीवन की समरसता को पद्य में सहज ही ढाला जा सकता है । किन्तु पद्य गूढ़ होते है, वह संक्षिप्त होते है । वही गद्य शब्दों का सीधा साधा क्रम होता है, जो बिना किसी लय और ताल के  बहता है। यहाँ बातें आसानी से व्यक्त तो हो जाती है किन्तु मन के स्थान पर मस्तिष्क का प्रतिभाग कुछ अधिक होता है। यहाँ मन से मेरा अभिप्राय मष्तिष्क के उस भाग से है जो कला एवं मनोरजन से संबंधित गतिविधियों का अनुमोलन करता है, जबकि मष्तिष्क से मेरा अभिप्राय तार्किक एवं वैज्ञानिक गतिविधियों में निपुढ़ मष्तिष्क के भाग से है। यही कारण है कि पद्य, गद्य से प्राचीन है। रचनाओ को संचित करने का कोई उपाय न होने के कारण प्राचीन समय में रचनाये कंठस्थ  की जाती थी। पद्य लयबद्ध होने के कारण सहजता से याद हो जाते थे। यही कारण है कि अठाहरवी शताब्दी तक हिंदी साहित्य में पद्य का ही बोलबाला रहा। भारतेंदु हरिश्चंद्र के आगमन के साथ गद्य साहित्य का आविर्भाव हुआ। लेकिन वर्तमान में साहित्य संचय के प्रचुर साधन होने के कारण गद्य साहित्य का प्रबल स्तम्भ बन गया है। समाचार पत्र से लेकर लघु कथाये, हास्य व्यंग, कहानिया, रिपोर्ट एवं अनेको  गद्य विधाए विकसित होती गयी है । लेकिन फिर भी मन के भावो को आज भी गद्य में पद्य कि सहजता से  व्यक्त करना आसान नहीं है।

कृते अंकेश 
मेरे पिताश्री द्वारा कृत एक उर्दू कविता..... जितनी मुझे याद है वही लिख रहा हूँ ....


मत पूछ की क्या क्या दिन दिखाती है मुफलिसी
की यह वही जाने कि जिस पर आती है मुफलिसी
मुफलिसी कि क्या सुनाऊ क्वारी झिडकिया
खाने को न घर में  न  चूल्हे मैं लकडिया
 तन के कपडे तक ले जाती है मुफलिसी
मत पूछ कि क्या क्या दिन दिखाती है मुफलिसी
............
 ये पंडित और मुल्ला जो कहाते है
मुफलिसी में यह कलमा तक भूल जाते है
कोई पूछे अलिफ़ तो बे बताते है
और जिनके यह बच्चे पढाते है
उनकी तो जिंदगी भर न जाती मुफलिसी
मत पूछ कि क्या क्या दिन दिखाती मुफलिसी 


कृते जिनेश चंद्राकर
कुछ थी हकीकत
कुछ था तमाशा
शायद रही कोई
छोटी सी आशा
सपना था कोई
या फिर सयाना
दिल ही रहा होगा
कोई दीवाना


वरना यह दिल फिर किसे ढूंढता है
नहीं सामने जो किसे ढूँढता है
वरना यह दिल फिर किसे ढूंढता है
नहीं सामने जो किसे ढूँढता है



सपनो के बादल
भी लगते निराले
जिसको यह चाहे
अपना बना ले
इनको पता क्या
है क्या हकीकत
इनको कहा मिलती
इतनी ही फुर्सत



यह तो सदा उनको सपनो में ला दे
नहीं जो भी मेरा वो मेरा बना दे
वरना यह दिल फिर किसे ढूंढता है
नहीं सामने जो किसे ढूँढता है

तुम भी कभी
और हम भी कभी
शायद रही होगी
उलझन यही

वरना यह दिल कब कहा हार माने
हजारो हो कोशिश नहीं फिर भी हारे
न जाने यह किसे ढूंढता है
है वो कहा यह जिसे ढूँढता है
न जाने यह किसे ढूंढता है
है वो कहा यह जिसे ढूँढता है

कृते अंकेश
उड़ जा पंछी
तुझे फिकर क्या
किसका सपना
तुझे रोकता
तेरी मंजिल
तेरा  रस्ता
खुला आसमा  
रोक टोक क्या


तेरे पंखो में सजते है
इस दुनिया के सपने प्यारे
जा पंछी तू अपनी धुन में
अपने रंगों को अपना ले

यहाँ वक़्त की बड़ी कमी है
 रिश्तो के संग्राम यहाँ है
उलझन में रहते है सपने
पगले अपना  काम कहा है

जिन्हें अभी तक लगता है कि
नशा नहीं उनका तुझको है
बुनने दे उनको कुछ चेहरे
चेहरों की अब किसे फिकर है 


खोकर इन सपनो को अब
चेहरों की मुस्कान बना दे
बहुत मिलेंगे मौके तुझको
आज यहाँ तू रंग सजा दे ..............

कृते अंकेश
 

Saturday, February 11, 2012

एक छोटा सा बच्चा
छोड़ खिलोने कहा चला

घूमा दुनिया के मेले में
सुख दुःख के सभी झमेले में
रिश्तो में, यादो में,
जीवन के बाजारों में
रहे तलाशे ज्ञान के पन्ने
फिर से जीने की आशा में

एक छोटा सा बच्चा
छोड़ खिलोने कहा चला

सोया वो सागर के तट पर
खेला वो लहरों के घट पर
पानी के साथ बहा वो भी
अनजान मिलन की आशा में

एक छोटा सा बच्चा
छोड़ खिलोने कहा चला

न जाने कितना सीख गया
हसना रोना भी भूल गया
देखा मैंने उसको जाते
एकांत कही उस आँगन में

एक छोटा सा बच्चा
छोड़ खिलोने कहा चला



वही दूर एक छोटा बच्चा
हाथो को पंख बनाता है
लगता मानो बस उड़ता है
दूर चाँद तक जाता है
उस आँगन के कौने में
थी रही काठ की एक सीढ़ी
जो सटी हुई पत्थर से थी
थी शायद वो थोड़ी टेढ़ी
चढ़ रहा प्यार था उसपर
दुनिया से ओझल होने को
है शेष रहा ही अब क्या
कुछ पाने को या खोने को

एक छोटा सा बच्चा
छोड़ खिलोने कहा चला

और अंत में देखा उसने
एक रेल को आते
सभी खिलोने, छोटे बच्चे
कही दूर थे जाते

न जाने क्या हुआ उसे फिर
वो भी छोड़ चला जग को
देखा था मैंने बस
जाते जाते उस पग को

कृते अंकेश

Sunday, February 05, 2012

इसमें क्या आश्चर्य, प्रीती जब प्रथम प्रथम जगती है 
दुर्लभ स्वप्न सामान रम्य नारी नर को लगती है 

कितनी गौरवमयी घडी वह भी नारी जीवन की
जब अजय केसरी भूल सुधबुध समस्त तन मन  की 
पद पर रहता पड़ा देखता अनिमिष नारी मुख को 
क्षण क्षण रोमाकुलित, भोगता अनिर्वच सुख को 

यही लग्न है वह जब नारी जो चाहे वह पा ले 
उडुपो की मेखला कौमुदी का दुकूल मंगवा ले 
रंगवा ले पदों की उंगलिया उषा के जावक से 
सजवा ले आरती पूर्णिमा के विधु के पावक से 

तपोनिष्ट नर का संचित तप और ज्ञान ज्ञानी का 
मानशील का मान गर्व गर्वीले अभिमानी का 
सब चढ़ जाते भेट सहज ही प्रमदा के चरणों पर 
कुछ भी बचा नहीं पता नारी से उद्वेलित नर 

किन्तु हाय यह उद्वेलन भी कितना मायामय है 
उठता सहज जिस आतुरता से पुरुष हृदय है 
उस आतुरता से न ज्वार आता नारी के मन में 
रखा चाहती वह समेत कर सागर को बंधन में 

किन्तु बांध को तोड़ जब ज्वार नारी में जगता है 
तब तक नर का प्रेम शिथिल प्रशभित  होने लगता है 
पुरुष चूमता हमें अर्धनिद्रा में हम को पा कर 
पर हो जाता विमुख प्रेम के जग में हमें जगा कर 

और जगी रमणी प्राणों में लिए प्रेम की ज्वाला 
पंथ जोहती हुई पिरोती बैठ अश्रु की माला 

कृते दिनकर

Saturday, January 28, 2012

 जूते की अभिलाषा


चाह नहीं है किसी सुंदरी के 
पैरो मैं जा इठलाऊ 

चाह नहीं है किसी बड़े शोरूम में 
सजाया जाऊ  

चाह नहीं है मंदिरों के बाहर में 
छोड़ा जाऊ

मुझे उठा लेना ओ राही
देना तुम उस सर पर फेक 
भ्रस्टाचारी और घूसखोर कोई 
इठलाता हो जहा बना नेक

कृते अंकेश

Thursday, January 26, 2012

तस्वीर कभी  धुंधली होगी 
तकदीर कभी  उलझी होगी 
तुम कोशिश करके तो देखो 
यहाँ जीत नहीं मुश्किल होगी 

जो कहते है यह कठिन बहुत
शायद है वो  अनजान अभी
पर्वत भी चीर गया मानव
न खुद  की उनको पहचान अभी 

उलझो न तुम बस सपनो में
इनको अब सच कर जाना है
जो ख्वाब सजाया था तुमने
तुमको ही रच कर जाना है

दिन ढले रात या भोर उठे
पल को तो आना जाना है
सीमित है समय तुम्हारा यहाँ
जो कुछ चाहा कर जाना है


कृते अंकेश

Monday, January 23, 2012

उन आँखों ने क्या  देखा
मैं खुद को ही भूल गया
न  जाने  किन गलियों से गुज़रा
अपना ही घर भूल गया 

अब तो दीवारे भी बस तस्वीर वही एक लगती है
है अनजान रही  तो क्या
कुछ  अपनी सी लगती है 
लगता जैसे इन गलियों का सब कुछ खोया 
बस एक वही चेहरा दिख रहा 
न जाने  किन गलियों से गुज़रा
अपना ही घर भूल गया

(क्रमश:)
कृते अंकेश

Thursday, January 19, 2012

पंखो में भर ले चल कही मुझको ए सांझ तू 
सपनो ने है थकाया 
कैसे उनको मांग लू
रंगों से क्या शिकायत क्या उनसे हो गिला 
है उनकी तो यह फितरत जो कुछ भी है किया 
आँखों ने कुछ  सुना और कुछ दिल ने था कहा
एक छोटा सा था सपना वो सपना ही रहा
पंखो में भर ले चल कही मुझको ए सांझ तू 
सपनो ने है थकाया 
कैसे उनको मांग लू 
क्यों करते हो शिकायत किससे  है यह गिला 
रंगों को क्या पता, था दिल में तेरे क्या रहा
खो जाओ आज मुझमे रंगों का नूर है 
शायद हो यह तुम्हारा पर सपना कोई जरूर है 
पंखो में भर ले चलू कही तुमको  मै आज फिर 
जो कुछ था तुमने  चाहा
वो सब मैं दे सकू 

कृते अंकेश


Friday, January 13, 2012

मानो तो सब कुछ है
 न मानो तो कुछ भी नहीं
क्या दूर क्या पास
संशय, भ्रम या  विश्वास
अरे जाओ इतना वक़्त यहाँ किसके पास
बस सोच में न खो जाओ
छोटी सी जिंदगी है
हसो और हँसाओ
मन करता है तो खेलो
दोड़ो और घूमो

गप्पे लड़ाओ
दोस्तों के साथ खो जाओ
जो भी जी में आये वो करो
किसी से भी नहीं डरो

ये नीला है  आकाश
बस शुन्य ही है इसके पास
कल्पना मात्र  है देवीय विश्वास
फिर कैसा  भय और क्या अपवाद

( कृते अंकेश )

 

Thursday, January 12, 2012

कौन है वो चित्रकार
रचता है जो स्वप्निल संसार
छोड़ता न कोई प्रयत्न
सजाता माधुर्य स्वप्न

क्या किंचित भर उसको आभास
खेल रहा है किसके साथ
है अबोध मन या जीवन
पल भर में कर सकता गर्जन

या वह शिल्पी है प्रखर
जिसने देखे जीवन के हर स्तर
जानता है सुख दुःख हर एक बात
काल को भी देता मूर्त आकार

पर मानव मन की कल्पना विशाल
क्या भान सका उसको अनजान
शून्य पटल पर नभ का चुम्बन
थे सरल रहे कब इसके स्वप्न

(क्रमश:)
(कृते अंकेश)
बच्चे
तुम रोते क्यों हो
तुम हसते हो तो ज्यादा अच्छे लगते हो
लेकिन शायद तुम्हे पता है
कि लोग  सिर्फ तुम्हारी और देखेंगे, मुस्कुराएंगे और फिर चले जायेंगे
यदि तुम बस  हसते रहोगे
कितने चालाक हो न तुम 
लेकिन इसमें दोष तुम्हारा कहा  है
यहाँ भावनाए तो तभी समझी जाती है न
जब वह  टूट कर शरीर से बिखरने लगती है
चेहरा जब  उन्हें और नहीं छिपा पाता
और अंतरपीड़ा आँखों में  उभर आती  है
तभी तो जग को तुम्हारी याद आती है
मैं नहीं रोकूंगा तुम्हे रोने से
क्योंकि  आज नहीं है मेरे पास साधन तुम्हे हँसाने का
लेकिन मेरे बच्चे बहुत जल्दी तुम्हे सीखना होगा
चुप होना
क्योंकि व्यस्त संसार को तुम्हारा क्रंदन शीघ्र ही ख़ामोशी सा लगने लगेगा
और तब तुम्हारे रोने का भी मकसद नहीं रह जायेगा

कृते अंकेश

Tuesday, January 10, 2012

मैं प्यार करता हूँ
चेहरों पर खिलती मुस्कुराहटो से
जिन्दगी से
सुबह से शाम से
उस फूल से
जो मुरझाने से पहले बिखेर जाता है मुस्कराहट न जाने कितने दिलो में
आसमान में सजे हुए तारो से
लहलहाते हुए खेतो से
धूप में खिलखिलाकर दोड़ते हुए बच्चो से
मैं जानता हूँ
की दुनिया खूबसूरत है 
इसलिए उठो और साथ दो उनका
जो लड़ रहे है जिन्दगी के लिए
प्यार के लिए
खुशियों के लिए
एक सुन्दर कल के लिए


कृते अंकेश


 

Sunday, January 08, 2012

आँखों का अंतिम निर्णय था
आंसू अब तुम बह जाओ
रात अँधेरी सुप्त भवन है
ऐसे में सब कह जाओ 

 कब तक रोके  पलके तुमको
उनको भी अभ्यास कहा
 देखो जीवन ऐसा ही होता है
तुमको न था आभास  यहाँ

अर्धरात्रि  के अंधियारे में
चहरे की आभा खोती है
उन पलकों से जब दो छोटी
अश्रुधारा रोती है

 कृते अंकेश

Saturday, January 07, 2012

थोडा धीरज रखो
अपने भी दिन फिरेंगे
यह माट की हडिया हटेगी
टाट हट परदे सजेंगे
देखना चूल्हे में अपने
आग अब हरदम जलेगी
बर्तनों में पानी रहेगा
यह धारा आँखों से  न बहेगी
 
गाडियों में बैठकर
हम भी  कही फिर दूर होंगे

रात भी अपनी कटेगी
शांत सब  स्वप्नों  में  रहेंगे      
इतना सभी कुछ मिल सकेगा
सच बताता हूँ तुम्हे
जो यदि में पढ़ सका  उन सभी की तरह 

कृते अंकेश

Friday, December 30, 2011

तेरे उतारे हुए दिन संभाल कर रखे है यादो में
बहुत कुछ भूला पर यह  फिर भी याद रहे
आज भी जब खुलते है  तो सिलवटे तक नहीं दिखती
लगता जैसे गए रोज़ ही तो उतारा गया था इनको
और संभाल कर रख दिया गया था फिर करीने से उस कौने में
समय के बक्से में बंद करके
लेकिन चाबियाँ भूल जाता हूँ कभी कभी
भटकता हूँ फिर यहाँ से वहां
बाहर भी तो बारिश बस तेरी ही याद दिलाती है
फिर अन्दर आता हूँ तो देखता हूँ
की बक्से पर तो कोई ताला ही नहीं है
शायद अभी भी कोई सोचता है कि इनको फिर से निकाला जायेगा
और दिन को फिर से उतारा जायेगा

कृते अंकेश

Wednesday, December 28, 2011

आहिस्ता हर पल गुज़र गया
देखो अब यह भी साल चला
कुछ हलचल लाकर कभी गया
खामोश कही  यह चला गया 

 सपनो के बादल बने कही

खुशियों की बारिश हुई कही 
कुछ राहे खोयी रही यहाँ 
अनजान किनारा कही मिला 

सुधबुध थे जो अपने सपने  में
जिनकी किसको भी फ़िक्र नहीं
वो राजमंच  पर आ चमके
उनसे सत्ता भी डरी हुई  

कुछ ने ठोकर खा सीखा चलना
कुछ को यह चलना सिखा गया

जो  भटके  थे इस वीराने में
उनको मंजिल यह बता गया

आभार तुम्हारा है हर पल
जो कुछ भी तुम दे जाओगे
है वही सम्पदा अपनी तो
ले  नए वर्ष  में जायेंगे

कृते अंकेश

Sunday, December 25, 2011

ओ हेनरी कि कहानी से प्रेरित 

मिस्टर शाह  काम के अम्बार से परेशान थे
कभी देर से बजते टेलीफ़ोन  को उठाते
तो कभी कंप्यूटर की स्क्रीन को देख चकराते
ऑफिस का यह व्यस्ततम  महीना था
और मिस्टर शाह से काबिल वहा दूसरा कोई नहीं था
इतने में जूली ने फाइलों का ढेर लाकर मेज़ पर रख दिया  
और बॉस की उस पर्सनल  सेक्रेटरी के कपड़ो से आती सुगंध ने मिस्टर शाह का ध्यान भंग कर किया
लेकिन आज जूली के अंदाज़ में कुछ परिवर्तन था
और चंचल सी दिखने  वाली उस  लड़की के व्यव्हार  में गंभीरता का पुट था
वह आई और एकदम शांत होकर अपनी कुर्सी पर बैठ गयी
और दोपहर देर तक बिना यहाँ वहा जाये वही बैठी रही
जब दोपहर बाद गार्ड अंदर आया
तो जूली ने उसे बुलाया और पूछा
क्या नयी सेक्रेटरी के लिए अभी तक कोई आया
यह सुन मिस्टर शाह चोके
गार्ड ने कोने में पड़ी कुर्सी की और इशारा किया
और शायद जूली और मिस्टर शाह दोनों ने एकसाथ उस कुर्सी की और अपना ध्यान किया
और पता नहीं क्या हुआ की उसके बाद मिस्टर शाह को न तो बजते हुए टेलीफ़ोन की फिक्र रही
और न ही कंप्यूटर स्क्रीन की और उनकी  निगाह गयी
जूली उस नयी लड़की को देखते ही मायूस  हो गयी
इससे पहले कि चपरासी बॉस के केबिन में जाता
बॉस बाहर आये और जूली को आने वाले सप्ताह में करने वाले सारे काम बताये
जूली कुछ पूछ  पाती कि चपरासी  बोला
सर वीं टाइम वालो ने नयी  सेक्रेटरी को भेज दिया
यह सुन बॉस ने शंकित होकर कहा
मैंने कब नयी   सेक्रेटरी  के लिए बोला
जाओ उसे वापिस जाने के लिए बोलो
और मेरे केबिन में जोह्न्सोंस की फाइल भेजो 
कोने में कुर्सी पर बैठी वह लड़की चपरासी का सन्देश सुन कर चलने के लिए उठी
बाहर जाते हुए रास्ते में  मिस्टर शाह की मेज़ भी पड़ी
फाइलों में खोया जवान अभी तक पता नहीं किन खयालो में खोया हुआ था
की उसे उस कन्या के आने या जाने का पता ही नहीं चला
बाहर जाते हुए जब उस लड़की ने चपरासी को उसके सहयोग के लिए धन्यवाद् कहा
और उस मधुर स्वर ने मिस्टर शाह को उनकी काल्पनिक दुनिया से बाहर किया
वह बोले "में यह कर कर ही रहूँगा"
वह तुरंत बाहर गए
उनके हाथ में अभी भी पेन और कुछ कागज़ थे
लड़की अभी गेट के पास ही थी
मिस्टर शाह ने उसके सम्मुख जाकर कहा
मुझे आपका नाम भी नहीं पता
और मेरी जिंदगी व्यस्तता से भरी हुई है
मेरे पास बिताने के लिए बस एक क्षण है
और में उस क्षण में आपसे प्रेम करता हूँ
यह क्षण मैंने उन लोगो से चुरा लिया है
वहा वह मेरा इंतज़ार कर रहे है 
लेकिन यह क्षण बस मेरा है
और मैं यह आपको  दे रहा हूँ 
वह लड़की स्तब्ध थी
मिस्टर शाह बोले
क्या आप इतना भी नहीं समझती 
क्या आपको प्रेम का अर्थ नहीं पता  
मैं आपसे विवाह करना चाहता  हूँ
 पहले तो उस लड़की ने अजीब सा व्यवहार किया
फिर वह मुस्कुरायी
उसने अपनी बाहों को मिस्टर शाह के कंधे में डाला
और बोली पहले तो में शंकित थी
लेकिन अब सब कुछ ठीक है
क्या तुम भूल गए
पिछली शनिवार को हम दोनों ने उस चर्च  में विवाह किया था
और मुझे डर था कि काम में तुमने मुझे बिलकुल भुला दिया था

  
अंकेश Jain

Monday, December 19, 2011


मेरा घर
घर के सामने सड़क
सड़क के उस पर हलवाई की दुकान
गरमागरम जलेबिया और कचोरियाँ
बच्चो के झुण्ड
सुबह सुबह स्कूल जाते बच्चे

ऊनी वस्त्रो से झांकते नन्हे नन्हे चेहरे
घडी की टिक टिक
कुछ आठ बजे का समय
सूरज का नामोनिशान नहीं
हल्का सा धुंध है
मेरे पैरो पर अभी भी रजाई है
हालाकि खिडकियों से आती हुई ठंडी हवा चहेरे को कबका जगा चुकी है   
लेकिन आँखे अभी भी अर्ध्सुप्त है
मैं खुश हूँ यह सोमवार सभी बन्धनों से मुक्त है

कृते अंकेश

Sunday, December 11, 2011

हे गीत मिलन हे माधुरी
हे स्वरगर्भित प्रियवासिनी
अनुरंजित सामीप्य तुम्हारा
जीवंत तुम्हारी रागिनी
गीत  मिलन हर पल हर क्षण
अनिरुद्ध  हो तुम  युग वासिनी
स्वरसाध्य प्रिये मुस्कान मधुर
है सत्य या दिवा स्वप्न यह रागिनी

कृते अंकेश 
आवहु मिली सब खेले भाई
बहु दिन पाछे यह घडी आई
मत  पूछो कहा ऋतु गवाई
सम्मुख तोहरे अब जानो पाई

बस इह ठोर जमेंगे अब मेले
रहे वहा परदेश अकेले
तेरी सोह न भूले पाई
चाहे भले ही बरस बितायी

कृते अंकेश 

Saturday, December 10, 2011

मैं कौन हूँ
बस एक दर्शक
तुम एक कुशल नर्तकी
शब्द बध्द तुमको  करने का दुस्साहस में नहीं करूंगा
तुम बस यु ही गीत लिखो
अपने करतल
अपनी गतियो से
अपना ही संगीत रचो
अपने इस आवेग  में बहकर जीवन का हर गीत रचो
मैं तो बस  शब्दों में खोकर
उन  मधुर रसो का पान करूंगा
मैं कौन हूँ
बस एक दर्शक
तुम एक कुशल नर्तकी


कृते अंकेश

Friday, December 09, 2011

संदेह 

अचानक आई बारिश ने मुझे ऊपर से नीचे तक पूरा भिंगो दिया.......  भींगने का कोई डर शेष नहीं  रहा ...... मुझे संदेह है कि भ्रस्टाचार में डूबे लोगो को कोई डर होता होगा ||

 कृते अंकेश

Thursday, December 08, 2011

भेडियो को आज भी शहरों मैं पनाह नहीं मिलती
वो तो कुछ इंसान ही है
जिनके कृत्य ऐसे है
वरना आदमी और भेडियो के अंतर को समझने के लिए दो आँखे कम नहीं होती

कृते अंकेश
अकुशल श्रम की लागत
अब भी रोटी ही होती है
क्या जाने वो बेचारे
श्रम की कीमत कितनी  छोटी है

कृते अंकेश 

Wednesday, December 07, 2011

नशा 

तुम्हारी कविताओ में कुछ भी तो नहीं मिलता
उसने कहा
और चाय का प्याला पकड़ा दिया
देखो इस चाय की सुंगंध को
क्या ला सकते हो इसे अपनी कविताओ मैं
मैं जब भी लेता हूँ इसकी चुस्कियां
देती है एक स्फूर्ति का आनंद
वह बोला,
मेरे  दोस्त
जिसे तुम आनंद कहते हो
वह तो मात्र एक नशा है
और आप बस उसी नशे में खो जाते हो, मैंने कहा,
तो क्या आपकी कवितायेँ किसी नशे से कम है,
क्या आप नहीं खो जाते है इनमे
उसने चाय का प्याला मेज़ पर रखकर कहा 
हकीकत तो यह है यहाँ सभी नशे के शौक़ीन है
बस सबकी पसंद अलग अलग है

कृते अंकेश


Monday, December 05, 2011

इंदु क्या छवि तुमने बसायी
निशा श्यामल सी होकर आयी
खेल है या यह कोई पुराना
हूँ  रहा मैं जिससे अनजाना
अब  ढूंढता निज को भटकता
होगी  मिलन की आस क्या
साथ जब तुम ही रहे न
तो भला उन पर विश्वास  क्या

सेकड़ो तारे भले ही
नभ में हो जो टिमटिमाते
घिरती घटा काली घनी है
छोड़ अपने जब है जाते
होना  सवेरा है सुनिश्चित
पर रात का लम्बा सफ़र है
कैसे चलू तू ही बता
मीलो छाया तम का कहर है

कृते अंकेश

Sunday, December 04, 2011

स्वप्न है मेरा यह जीवन
कल्पना मेरी ही है
दिख रहा जो शांत सम्मुख
स्वप्न की कर्णभेरी  है
बस सजाता कल्पनाएँ

स्वप्न से श्रृंगार करता
अज्ञात हूँ सुख से दुःख से
स्वप्न में ही प्यार करता
कुछ अधूरे  कुछ अनोखे
बहुप्रतीक्षित स्वप्नों की ढेरी
कल्पनाओ से सजी है
बस यहाँ दुनिया यह मेरी

कृते अंकेश