Sunday, June 01, 2014


नेताजी क्या हाल हुआ है
देखो इस स्टेट का
बना हुआ है अड्डा यह क्यो
मर्डर और रपे का

कहा बनेगा उत्तम प्रदेश
क्या उत्तम मतलब उजड़ा है
देखो समय अभी भी बाकी
गणित अभी न बिगड़ा है

कुछ तो सोचो, कुछ तो समझो
जनता को न बहलाओ
लल्लू अगर नहीं है काबिल
खुद ही कुछ कर दिखलाओ

कृते अंकेश
खिड़किया समय के परदे होती है, यह बिना समय गवाए बाहरी दुनिया तक पहुचने का एक माध्यम है, खिड़कियो के सहारे ही हम अपने अपने घरो अथवा कार्यालयो में बैठे रहकर ही बाहरी दुनिया से सम्बन्ध स्थापित कर लेते है, खिड़किया हमें वह दिखाती है जो हम देखना चाहते है। यह द्वार नहीं है जिससे बाहर जाने पर आप पूरी तरह से एक दूसरी दुनिया में आ जाते है, खिड़कियाँ आपको दूसरी दुनिया तक लेकर तो जाती है, लेकिन बिलकुल चुपचाप, एकदम गोपनीय तरीके से, आप चाहे तो किसी भी समय खुद को एक झटके में फिर से पहली दुनिया में खीच सकते है , वस्तुत: आप कभी शारीरिक रूप से दूसरी दुनिया में जाते ही नहीं है बल्कि आपके दृश्य पटल पर दूसरी दुनिया के अभिदृश्यो को उकेरा जाता है, शायद इसीलिए खिड़कियो का खुलना ज्ञान की अभिवृद्वि का प्रतीक माना जाता है । खिड़किया चाहे दीवारो में हो, तन में हो अथवा मन में हो, इनका खुलना हमारे ज्ञान क्षेत्र को विस्तृत बनाता है । समय के साथ साथ यह खिड़कियाँ भी विकसित होती गयी, रेडियो, चलचित्र, दूरदर्शन, इंटरनेट आदि खिड़कियो के आधुनिक रूप है जो हमें विभिन्न प्रकारो से दूसरी, तीसरी एक अनेको दुनियाओं से जोड़ते रहते है

कृते अंकेश

मुझे पत्तो में खुशबुओ को बटोरने की आदत है, पत्ते स्वभाभिकत: खुशबू को नहीं संजोते है लेकिन पुष्प के सानिध्य में रहकर वह खुशबू के भी साथी हो जाते है, वैसे जरूरी भी तो नहीं पुष्प सभी के हिस्से में आये। इन पत्तो की महक पुष्प के मिलने से कही अधिक मादक होती है क्यूंकि पत्ते पुष्प की तरह क्षणभंगुर नहीं होते, यह एक लम्बा जीवन जीते है

कृते अंकेश

Wednesday, May 14, 2014



यह कविता अभी कुछ  पंक्तियो तक और चलेगी
जब तक कवि को नही मिलता एक शीर्षक
जिस पर लिख सके वह एक कविता
वैसे ऐसा नही है कि  कविताएँ शीर्षक  मिलने पर ही लिखी जाती हो
और वास्तविकता तो यह है की अधिकांशत: कवितायेँ शीर्षकविहीन ही होती है
जीवन की तरह
कौन जानता है अपने जीवन का शीर्षक
या अगर हम कुछ मान  भी लेते है तो कितना सटीक उतरता है वह शीर्षक जीवन पर
जीवन  तो जिया जाता है स्वछंद, अपनी ही धुन और अपने ही हिलोरो मैं
ठीक उसी तरह कवितायेँ भी बहती है  विचारो की गंगा में
शीर्षक के बंधनो  से परे
एक अन्त की ओर

कृते अंकेश

Tuesday, May 06, 2014


I equally enjoy conversation and silence
and feels as if both are my friends
conversations takes me to the world of others
while silence brings me to of my own

Ankesh

Friday, May 02, 2014

क्यों उदासी से भरी तेरी खुशी, तेरी हसी
क्यों हैं गुमसुम सी पड़ी, रंगीन तेरी जिंदगी
क्यो खिला चेहरा तेरा, है आँसूऔ से भीगता
यह निशब्द वाचाल मन, आवाज किसकी खीचता
क्या रूके है पग कभी, जिंदगी के शमशान से
है सफल वो जिसने देखें, सुख और दुख मेहमान से
ठोकरो में जो चला है, जिंदगी के हर कदम
छीन ही लाया है सपना, था सहेजे उसका जो मन

कृते अंकेश
मन सरगम है, दिल छूटा क्यों
क्यों रुठ गया सपना मन का
अपना न सका जीवन जिसको
वो पंझी पनघट छोड़ गया
रात अधेरी अब किसे पुकारे
अपना कौन यहाँ होगा
उड़ता बादल कहाँ को बरसे
सूना आगन फिर से होगा

कृते अंकेश

सोचकर देखो क्या बसंत आएगा
अभी तो गिरा था लहू
जमीन से उसका निशान भी नहीं मिटा
क्या इन घाटियो में फूल फिर से खिल पायेगा
सोचकर देखो क्या बसंत आएगा
वो डाल रहे है परदे आखो पर अनगिनत
पर क्या इस मन को भी कोई ढक पायेगा
सोचकर देखो क्या बसंत आएगा
मुझे नहीं पसंद है उदासी और रक्तरंजित तस्वीरें
पर क्या जेहन में जो बसा जो जा पायेगा
सोचकर देखो क्या बसंत आएगा

कृते अंकेश

Sunday, April 27, 2014


इस अंधियारे युग में तुम जिसे प्रकाश समझते हो
वह तो एक दावानल है
अभी तुम्हे जगमगाहट दे रही है
लेकिन दूर नहीं दिन
जब वो सब कुछ जला जाएगी
जो लोग तुम्हे इससे दूर जाने को कहते है
समझो कि  वो तुम्हारे शुभचिंतक है
वैसे इतना आसान भी नहीं है
प्रकाश को छोड़कर अन्धकार में जाना
लेकिन जो प्रकाश तुम्हे अनायास मिला है
वह तुम्हारा कैसे हो सकता है
समझो की यह मात्र भ्रम है
चेतो इससे पहले कि तुम्हारी चेतना शून्य  हो जाए

कृते अंकेश

Tuesday, April 22, 2014


इस कोरे  कागज़ पर लिख सकते हो रहस्य अंतरिक्ष के
सुलझा सकते हो सभी  समस्याएं विज्ञानं की
अंकित कर सकते हो गणनाएं जटिल से जटिलतम

या लिख सकते हो एक कविता किसी के अनुभावो की
अथवा कोई कहानी वास्तविक या काल्पनिक
भरना चाहो तो भर सकते हो  इसको रंगो से
सजा सकते हो अपने सम्पूर्ण सपनो को इस पृष्ठ में

 दे रहा है समय तुम्हे मौका
 इस पन्नें से होकर बार बार इस दुनिया में गुजरने का

कृते अंकेश

Saturday, April 19, 2014


लल्ला चो रे
को जीतेगो जा बेर
टोपी कि मोदी
का कहतु है
अरे चचा पंजा ए काए भूल गए
तुमन्ने तो वइये जितायो  है हर बेर
अरे लल्लू का बताये
ससुर जो हाथ सर पे समझत रहे
वो गलो दबा के निकल लओ
अबे तो तू बता
काइको बटन दवाएगो
टोपी कि  मोदी

कृते अंकेश

हाथ में लेना तिरंगे को अगर अभिमान है
इसके रंगो की अगर तुमको फिर पहचान है
देखना न रंग कोई फिर तुम्हारे माथे चढ़े
जो चढ़े तो बस तिरंगा ही हमारी मृत देह पर चढ़े

कृते अंकेश
वो थी बात पुरानी जब नर होता था नारी पर भारी
आज की नारी डायटिग करती, होती खुद ही न भारी
मनुष्य को देवता न बनाओ
सर्वत्र उसके गुण न गाओ
वह इस भूमि के अपराधो का भागी है
उसे स्वर्ग में न लेकर जाओ

कृते अंकेश
फागुन की रिमझिम की झिम झिम
भींझ रही गलियन, गलियन के जन
पोखर बन गयी सिगरी गलिया
बाल चलावे नावन की नदिया
लगो की आयो फिर से सावन
छाड़ लाज़ भींजत है जन मन
फागुन की रिमझिम की झिम झिम

फिर फिर आवत जाड़े की कपकप
होली जले तो आवे राहत 
त्योहारन को लगो महीना
जमके सबको भंग है पीना
करत रहे सब बस यह बतिया ठोरे
फागुन कि कछु बातही औरे

फागुन की रिमझिम की झिम झिम

कृते अंकेश
कहू किसे यो मन की बात
सभी सखी कान्हा के साथ
क्या कान्हा रूठे है मुझसे
कौन बतावे मुझको आज
बंसी आज तुझे नहीं कोसू
तू ही श्याम का ध्यान बटा
इन गोपियो के जमघट से तू
मेरे कान्हा को मुक्त करा
फिर चाहे तू ही कर लेना
उसके अधरो पर अधिकार 
व्याकुल मन की पीड़ा को पर
हर ले ओ मुरली तू आज

कृते अंकेश
मनमोहक ग्वाला नन्द का लाला, वो ब्रजवाला गया कहा
बंशी को छाडे, गइयन को ठारे, राधा का प्यारा गया कहा
श्यामल अखिया, धावल बतिया, मोर मुकुट, कटि कमर कसे
ग्वाल बाल संग आवे जावे, मुख माखन तस्वीर सजे
कहा ओ मैया तेरा कन्हैया, किस बंसी के साथ फिरे
सूनी गलिया तीर है यमुना, ब्रज अब किसके संग हसे

कृते अंकेश
मन मोहक मुस्काती मुरली, मुख माखन मस्तक मोरपंखी
मृदुल मनोहर मणिकर मध्ये, माधव मन मंदिर में मिलते
माटी मथुरा माथे मंजुल, मानस मांगे मिलना मधुकर
मिटतो मन मेरो मोह में माधो, मेरी मन मझधार मिटादो

कृते अंकेश
बोलो किसकी यह तैयारी है
जब साथ में भ्रष्टाचारी है
दल बदलू इससे उससे
क्यो हुई दोस्ती प्यारी है
है सत्ता तो दूर अभी
माना तुम मशहूर अभी
पर प्यारे न यु चाल चलो
जीती बाज़ी न हार पड़ो

कृते अंकेश
कौन बताऔ जग में ऐसा
जिसने खेली है न होली
कोई खेला इसके रंगो से
और किसी की रंगी है चौली
यह न पूछो रंग यहा पर
किसने किस पर कैसा डाला
सभी हुए रंगीन यहा पर
रंगो का यह खेल है सारा
आऔ खोकर सुधबुध अपनी
इन रंगो में ही खो जाए
रंगो से ही अपने जीवन को
इन रंगो सा रंगीन बनाए

कृते अंकेश

इक मन तन्हा
इक मन सूना
इक मन ख़ामोशी में गुमसुम
कितने टुकड़े, कितने जीवन
कितने पल और कितनी उलझन

कृते अंकेश

हैं मनोहर नग्न पीड़ा
आसुंओ का आघात भी
विष के प्याले है सुखोदर
और घृणा का साथ भी

हार में भी है मजा और
मूल्य तिरस्कार में
मिलते है अनुभव अनोखे
हुए दुर्व्यवहार में

लेकिन रहे है जो अभी तक
सीमा में स्नेह और प्यार की
जानते है क्या वो सीमा
इस अनोखे संसार की

कृते अंकेश

कुछ नटखट सा कुछ चंचल सा
ऐसा ही होता है बचपन
माँ की गोदी से पापा के हाथो में
होकर गुज़रना होता है बचपन
अपनी सारी मांगो को बेहिचक मनवाने का
अधिकार होता है बचपन
और सभी लोगो से ले लेना
ढेर सारा प्यार, होता है बचपन

अपनी शैतानियो से लोगो को 
हँसा देना होता है बचपन
बस यु ही किसी भी बात पर
आंसू बहा देना होता है बचपन
चीज़ो को सीखने की असीमित
और अटूट लगन होती है बचपन
मनुष्य के जीवन की
सुनहरी किरण होती है बचपन

कृते अंकेश
मुझको डुबो कर गया है समय जितनी बार
निखर गया है यह चेहरा उतनी ही बार
धुल गयी है शंकाए मेरे मन की
बह गयी है कश्मकश जीवन की
नहीं दिखें इस चेहरे पर फिर चिंताओ के तार
मुझको डुबो कर गया है समय जितनी भी बार

कृते अंकेश
दोहा

मोदी आगे बढ़ रहे, खीचे केजरिवाल
मैडम फ़ौरन से कही, लेट्स मेक सरकार

कृते अंकेश

जो कहते है
इन इंसानो को
आता ही नहीं चलना, उड़ना
जाना ही क्या है, उनने अभी
सपना इंसा का है अपना
उड़ता है वो, बहता है वो
रहता है वो, अपने में मगन
यह दुनिया अभी इस काबिल न
समझे जो उस इंसा का मन
रंगता है वो, लिखता है वो 
छेड़ा करता है धुन भी नयी
माना कुछ शब्द है मिले नहीं
पर यु कविता रही न अधूरी कभी
उसको इन सपनो को चुनकर
है रंग हकीकत में ढल जाना
चेहरे बदलेंगे सपने भी
पर हर सपने को सच कर जाना

कृते अंकेश
मोदी विकास पुरुष नहीं विनाश पुरुष है
शादी न कर वंशवाद का विनाश किया
इतने सालो में एक अच्छा सा घोटाला न कर
पूजीवाद का विनाश किया
गुजरात को औद्योगिक बनाकर
साम्यवाद का विनाश किया
सदभावना रैली करवा कर
धार्मिक भेदभाव का विनाश किया
नादान है वो जो कहते है की
मोदी विकास पुरुष है

कृते अंकेश
लैपटॉप पर कोडिंग करती
की बोर्ड चलाती माँ
में जाकर हेल्प कराऊँ
तो मुझे दूर भगाती माँ
ए इ आई बोल समझाऊ
फिर भी हेल्प नहीं लेती माँ
जब तक में गुस्से से न चिल्लाऊ
लैपटॉप नहीं छोड़ती माँ
 
थी वो छोटी सी बमुश्किल साल भर की ही रही
में नया था उस शहर में
वो थी दुनिया में नयी
दूर से देखा मुझे और दूर से निकली गयी
खींचती रेखा अनोखी
मानो कहती हो
सोचना इसमें आने का भी नहीं
था वो मेरी मौसी का घर
धर्म की नगरी प्रयाग
डाला था मैंने वहा
अपनी शिक्षा का पड़ाव
और फिर दिन कैसे गुज़रे
था समय भी दौड़ता
उस दौड़ के ही बीच में
कुछ समय मौसी के घर में भी गुज़रता
और वो नन्ही सी लड़की
कब मेरी गोद तक आने लगी
कुछ सुने और कुछ अनसुने अपने मन के किस्से सुनाने लगी
और भी बच्चे वहा थे पर वो उनमे सबसे छोटी रही
अपनी बातो से सदा वो ध्यान मेरा मोहती रही
कहती मुझको अंकेश वो
भइया भी थी जोड़ती
बाक़ी बच्चो से अलग पर वो नाम मेरा बोलती
मुझको यु तो उसने सिखाया काफी कुछ था उन दिनो
पर में बड़ा था सीख न सकता था सब उसकी तरह
पूछती मुझसे थी क्यो स्कूल में रहते हो तुम
मैंने बोला सब बड़े रहते है तो हो जाती गुमसुम
और फिर अगले ही पल बोली की होगे आप भी
में हँसा तो हसने लगी फिर वो मेरे साथ ही
खेलती थी खेल सारे वो मेरे साथ ही
हार कर भी जीतता में
उसकी हसी नादान थी
मुसकराती थी वो हमेशा
खेल से अनजान सी
लाती ठहाको का भी डेरा
सोचती हैरान सी
और फिर पूरा हुआ
मेरा भी शिक्षा का यह क्रम
बोला उसको फिर मिलेंगे
आप पड़ना लिखना फिर आ जाना स्कूल में मेरे ही संग
वो मगर अचरज में थी
था उसे न यह पता
में नहीं हिस्सा वहा का
चल भी दूंगा इस तरह
उसके बचपन ने हमेशा देखा मुझको था वहा
और अचानक छोड़ना मुझको भी अच्छा न लगा

कृते अंकेश

कितनी रातें थक कर मुझसे यु ही चुपके से निकल गयी
सुबह की किरणे उनके जाने का सन्देश लिए ही खड़ी रही

कृते अंकेश
वो हसे
और हस कर इनकार कर दिया
थी वही हसी
जिस पर हमने सब कुछ इजहार कर दिया
है कायदे यह वक़्त के
और मौसम के मिजाज़
मिलते है अब भी
लेकिन अब हम भी हसते है उनके साथ

कृते अंकेश
क्या सुन सकोगे गीत मेरा
ला नहीं पाया संगीत निरा
मांगू कैसे यहाँ मधुरता
जब फैली है निष्ठुरता

कह दे कोई उपवन है मेरा
सीचा इसको बस प्रेम से था
उजड़ा कैसे फिर घर यह मेरा
शत्रु परिचित उपवन में ही था

में आज भी लेकिन गाऊंगा
फिर गीत नयी उम्मीदो का
है सीखा मैंने जग से इतना
मुस्कानो को मिलने दो मौका

कृते अंकेश

थे कहा तुम
दूर पलके
थी निहारा करती प्रतिदिन

थे कहा तुम
मेघ आते
और बरसते यु ही रिमझिम

थे कहा तुम
यह पवन भी 
शोर करती थी सारा दिन

थे कहा तुम
रात बीती
जैसे बीता हो यह जीवन

कृते अंकेश

कितने शब्द बिखेरू आज
कुछ शब्दो में छिपा के राज़
केह जाऊ क्या सारी बात
कितने शब्द बिखेरू आज

सुनने वाले तोल रहे है
मेरे शब्दो के आगाज़
सुनने से ही पहले लगते
उनके है बदले अंदाज़
कितने शब्द बिखेरू आज 

मेरे शब्द बहुत है थोड़े
यहाँ वहा से लाकर जोड़े
कर सकता बस सीधी बात
नहीं छिपा सकता कुछ राज
कितने शब्द बिखेरू आज

कृते अंकेश

छोड़ न साथी साथ अभी
लम्बी है यह रात अभी
अधियारे मे कौन कहाँ
जाए बिछुड़ न चले पता
कुछ सभ्हले जो रात अगर
बनती हो जो बात अगर
फिर सुन लेना मुझको भी
कह देना जो दिल में थी
शायद हम जिद छोड़ भी दे
सपनो का रूख मोड़ भी दे 
तब तक आ खामोशी पी
यह पल भी मैरे साथ ही जी

कृते अंकेश
भौर भयी मन
खोल रे अखिया
आती किरण भी
जगती है सखियाँ
लाये नये रंग
दिन का उजाला
कोई सजायें
सपनो का प्याला
खेले कोई
पलको के किनारे 
करता रहे कोई
बस यू इशारे
सपनो की धुन में
कोई है जाता
पवनो का झोका
हमे भी झुलाता
मन मेरा जैसे
वासुंदी खाये
आकर हमे भी
कोई जगाये

कृते अंकेश

माँ एक किताब लिखी जो तूने
उसका पन्ना आ उड़ यहाँ गिरा
लोग जरूरत पड़ने पर है पढ़ते
तुझ सा इसे न कोई समझा

यहाँ किताबे इतनी सारी
क्या तुझको में बतलाऊ
तेरा आँचल भी तो नहीं है
बोल कहा अब छिप पाऊ

तूने रखा संभाले जिसको
वो अब धूल में उड़ता है
पन्ना है यह लेकिन तेरा
अपनी लेखनी से टिकता है

कृते अंकेश
यहाँ भूख से अकुलाते बच्चे की छाती अड़ी रही
और वहा उस थाली में रोटी बेसुध सी पड़ी रही

कृते अंकेश

बस साध लीजिये बात
जुड़े फिर  जाने किससे
कितने होगे हाथ
आएंगे किसके हिस्से

यह दुनिया है  घर
कि बेघर ढूंढें ठिकाना
आये गए है कितने
कितनो ने पहचाना

में समझा  कुछ बात
की पाया खुद को भ्रम में
बीत जाये यह रात
चले जायेंगे नभ में

कृते  अंकेश

Friday, April 11, 2014


पेट भरा जो हिन्दू का
जपे राम का नाम
मुस्लिम भरे पेट से करता
अल्लाह ही का ध्यान
जो खाली रह जाये फिर
हिन्दू मुस्लिम का पेट
आती दोनो के ध्यान में
चीज़ वही फिर एक
मिले कैसे न कैसे
खाना कही भरपेट

कृते अंकेश

Tuesday, April 08, 2014


कुछ कविताये छोड़ कर गया था
आकर देखा तो स्वीपर ने फेक दिया था कूड़े में
बेकार का समझकर
उसने तो गिनी भी नहीं होगी
कितनी कवितायेँ है
मेरे कहने पर बोला
सर आप कहे तो कुछ कविता लाकर दूंगा में
मेरी बस्ती में भी एक आदमी कवितायेँ लिखता है
फेक देता है कभी कभी मेरे कूड़े में
आपके जैसे ही पेज होते है कुछ खाली कुछ भरे 
मुझे उसका प्रस्ताव अच्छा लगा
सोचा इसी बहाने कुछ नयी कवितायेँ पड़ने को मिलेंगी
और कूड़े में जा चुकी कवितायेँ अपनी किस्मत पर पछतावा नहीं करेंगी

कृते अंकेश

Saturday, March 08, 2014

यह आंसू उम्मीद का द्योतक
सपनो की यह शेष है स्याही
जिनकी पलके गीली अब तक
उनकी उम्मीदो ने हार न पायी

कृते अंकेश
मुझे कोई गिटार दो
बजाऊंगा में सरगमें
छेड़ कोई तार दो
जुड़ी हो जिससे धड़कने
गीत कोई दे मुझे
सजा रखी है ख़ामोशी
मुस्कुरा भी दे कोई
कहा छिपी हुई हसीं

कृते अंकेश
तुम तक पहुचे तो कह देना
वरना बहने देना इन शब्दो को
न जाने किसकी प्यास बुझाये
कहते जो कहने देना इन शब्दो को

मैंने तो बस कलम चुनी है
स्याही कागज़ पर बिखराई
न जाने किसने हाथो को मोड़ा
कागज़ पर कविता उभरी आयी

यह प्रश्न है जिसका भी लेकिन
हो उत्तर पास तो कह देना
न जाने किसकी प्यास बुझे
जो कुछ है सीधे कह देना

कृते अंकेश
लोग अपने आसूओ को पौछते थे बार बार
मैने सोचा क्यो न मैं खुलकर नहाऊ इनसे यार
रोकना क्यो निकला है जब आज अंदर का गुबार
देखे कहा ले जायेगी फिर, बहती हुयी यह जल की धार
कृते अंकेश
रात अँधेरे को लिए
लहरो पर सवार पास चली आ रही थी
और रेत के किनारे पर बैठी शाम हमें छोड़ कर जा रही थी
लोग इस सबसे अनभिज्ञ अपनी धुन में मदमस्त थे
रौशनी के पहरेदार चुपचाप परदे को बदलने में व्यस्त थे
कितनी आसानी से सब कुछ बदल जाता है
और यह जग फिर भी यु ही मुस्कुराता है

कृते अंकेश
इन कंक्रीट के जंगलो में
आदमी ही आदमी का शिकार करता है
गगनचुम्बी इन इमारतो के अंदर
एक गहरी खाई है
जिसमे सपनो का प्रतिबिम्ब दिखता है
जैसे जैसे आप ऊचाइयो को पाते है
वह प्रतिबिम्ब आपसे उतना ही दूर होता जाता है
हवा, रौशनी , हॅसी , मुस्कराहट सब अपनी है इस जंगल की
उतनी ही कृत्रिम जितनी की यह इमारत

कृते अंकेश
एक ठहरन ही तो है जो मुझको तुमसे दूर लिए जाती
वरना कितने अवसादो के बाद कहा रूक पाया में
मन के पंख उड़ा लेते थे कब के पास तुम्हारे फिर
ख़ामोशी, इनकारो से भी, कब कब था रुक पाया में

कृते अंकेश
एक आसू आखो से छूटा
पंखो में आ उलझा फिर
जो लगा सहेजे गिरा धरातल
जाने दे तू उड़ता चल
यह है बीज अगर बोएगा
आसू ही उपजाएगा
उड़ता चल तू अपनी धुन में
अभी बहुत कुछ पायेगा

कृते अंकेश
इंसान ने जब इंसानो से इंसानो को इंसानो की तरह जीने देने की प्रार्थना की है
उसे जानवरो की तरह ठुकरा दिया गया है
रेत दिया गया उसके गले को ताकि नहीं सुना जा सके कोई भी अक्षर
जला दिया गया उसकी लाशो को शहर से दूर ले जाकर
लेकिन मरने से पहले उन कापते गलो से निकले फिर भी कुछ अक्षर
जिन्हे नहीं समझ सकी सत्ता और मौत के सौदागर
हवा से बहकर फैल गए वह मीलो दूर जाकर
और सुनने लगे उसे सभी शहरो के कापते हुए मन

कृते अंकेश

Sunday, February 23, 2014


सुन्दर छवि या मोहक चेहरा या मुस्कान निराली
तेरे इन रूपो पर कवियो ने कितनी कविता लिख डाली
आज नहीं पर मेरी कविता तेरे रूप के गुण गायेगी
नहीं आज यह फिर से तेरी मोहकता पर इठलाएगी

आज समर्पित कविता उनको जो नहीं रूप को गाती
सौम्य, चातुर्य और चरित्र से जिनकी सुंदरता आती
संघर्षो का जीवन जीती जो रह दूर  किसी स्वप्न महल से
दुःख के सायो में भी चलती बिन हारे अपने कल से

उनके जीवन की  करुणा में जग का  सौन्दर्य छिपा है
उनके जीवन के आवेशो में जग का जोश छिपा है
उठकर आती अपने दम पर, अपना अस्तित्व है रखती
इस कविता की नायिका है वह , नहीं किसी पत्रिका की युवती

कृते अंकेश

Sunday, February 16, 2014

तुम तक पहुचना 
जितना आसान है 
उससे कही ज्यादा मुश्किल भी 
में हर एक बार तुम तक पहुचने से पहले 
न जाने खुद से कितनी बार गुज़रता हूँ 
लेकिन जब पंहुचा हूँ आखिर में तुम्हारे पास 
तुम कितनी आसानी से मुझे अपने साथ ले गयी हो 

कृते अंकेश

मैं लालायित तुम्हारे रूप, तुम्हारे बालो का
क्या भेजोगे उत्तर मेरे अनगिनत सवालो का
में प्रेम के विस्तार में संकीर्ण कितना हो गया
पल जिसे तुमने  बताया एक युग ही  खो गया
दे सकोगे क्या मुझे उपहार अब इंतज़ार का
आ सकेगा अंत क्या इस चीड़ के विस्तार का

मौन ही भाषा मेरी पर क्या तुम्हारे बोल है
अंकित छवि नयनो में मेरे शेष यह अनमोल है
कितनी ही लिखता रात उनसे बनकर बस यु अजनबी
शायद सुबह तुम सुन सकोगे क्या कमी मुझको खली
अब जबकि हम है खो चुके तुम आज भी फिर पास हो
न मिट सकेगा जो कभी भी वो आखिरी अहसास हो

कृते अंकेश

Saturday, February 15, 2014


जो लोग भीड़ में खड़े होते है
वो भीड़ से उतने ही दूर होते है
भीड़ हमेशा एकांत को तलाशती है
यह प्रकृति का विरोधाभास ही है
कि हम  हर उस चीज़ की कल्पना करते है
जो हमारी पहुच से कोसो दूर है
उड़ना मनुष्य ने सहज ही नहीं सीखा
यही विरोधाभास हमेशा उससे प्रश्न करता  रहा
कि क्या है आखिर वह जिसकी खोज में चले जाते है अनगिनत पक्षी
यही जिज्ञासा ले गयी उसे
असीमित ज्ञान के भण्डार के पास
उसने पंखो को कागज़ पर उकेरा
मष्तिष्क से परिष्कृत किया
और तकनीक के उपयोग से स्व्प्न को वास्तविकता  में बदला
बस कुछ इसी तरह भीड़ ढूंढती रहती है अनगिनत प्रश्न और उनके हल
इसी विरोधाभास के दम पर

कृते अंकेश

सुन रही हो क्या वो तुम
जो कहती खामोशी मेरी
मौन बनकर ढूढ़ती यह
बात दिल की अनकही
ला सकोगी क्या मुझे फिर
पास तुम दिल के मेरे
कह सकोगी शब्द क्या वह
अब तक रहे जो अनकहे
यू इस अधूरे गीत का
प्रस्ताव तुम तक बुन रहा
इक ध्वनि की आस में
फिर से खामोशी चुन रहा

कृते अंकेश

तुम तक पहुचाये ख़त कितने
कितनी रात गुज़री उन तक
कुछ शब्दो में, कुछ अश्को में
भींगे ख़त जो पहुचे तुम तक
न जाने क्या तुमने पाया
इंतज़ार में बीते पल फिर
इंतज़ार न खत्म, लिखा ख़त
चलता फिर से, फिर फिर यह क्रम

कृते अंकेश

Thursday, February 13, 2014


यह खिड़की ही मुझे जोड़ती है
उस हक़ीक़त से
जिसमे एक सुबह होती है
दिन निकलता है
शाम ढलती है
चहल कदमी, लोगो के आने जाने के स्वर
बस का हॉर्न, गाडियो की आवाज़
साईकिल की घंटी
लोगो की भीड़ का एकत्रित स्वर
सब कुछ
बता सकता हूँ
बिलकुल ठीक ठीक
कितने पल, घंटो, दिन और वर्षो से बैठा हूँ
इस खिड़की के इस तरफ

कृते अंकेश

Wednesday, February 12, 2014


प्रेम खोलता है सपनो को
प्रेम जोड़ता है अपनो को
प्रेम सुबह प्यारी सी लाता
प्रेम रात्रि शुभ कहता जाता
प्रेम हँसा करता होठो पर
प्रेम खिला करता चेहरो पर
प्रेम नहीं वैचारिक पुस्तक
प्रेम नहीं अनजानी दस्तक
प्रेम नहीं है व्याधि भारी
प्रेम नहीं है जिम्मेदारी
प्रेम का केवल परिचय इतना
मैंने तुमको समझा अपना

कृते अंकेश

Monday, February 10, 2014


बताइये यह क्या बात हुई
भ्रष्टाचार कूड़ा है
तो अगर वह कूड़े को खत्म कर देंगे
तो इन सुअरो को खाना कोन देगा
अच्छा तो क्या फिर वो सुअरो को ख़त्म करेंगे
तो फिर कूड़े का क्या होगा
वैसे भी  कूड़ा तो केवल सूअर नहीं फैलाते
कूड़ा तो सभी ने फैलाया है
तो सभी क्यो नहीं बंद कर देते कूड़े को फैलाना

कृते अंकेश


श्यामल तेरे केशो सी लगती आती हुई  काली घटा
इनकी घुंघराली छवि में कौन सा जादू बसा
है  नयन तेरे सरीखे कोई न पाया यहाँ
पलको ने तेरी सदा इनको छिपाये है रखा
ढूँढता है नभ जिसे वो चांदनी तुझमे छिपी
है अधूरा गीत इसकी रागिनी तुम हो कही
बढ़ रहा यादो से तेरी वक़्त का यह काफिला
उम्र ढल जाए मगर न ढल सकेगा  सिलसिला

कृते अंकेश

Friday, February 07, 2014


आप सभी के प्रेम एवं प्रेरणा से मेरी 400 वी रचना......

चाहे जिसका समर्थन करो 
जिसके विचारो से सहमत हो 
उसको बेहिचक अपना लो 
पहले ही बहुत समय खो चुके है हम
इस आपसी छींटाकशी में
शर्त बस इतनी सी है
जो भी मार्ग चुनना
तुम्हे बनाना होगा बेहतर भारत को

कृते अंकेश
बस इक बार कहो तुम मेरी हो
मैंने जीवन की राह चुनीं 
उस पनघट की ही छॅाह चुनी
जिस पर लगती तेरी फेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

मैंने शब्दों को बहलाया 
सब कुछ हैं उनको समझाया 
पहुचे जो तुम तक अगर कभी
कह देना फिर न देरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

कृते अंकेश
श्यामल केश, सजी मुस्कान
लटे घुघराली खींचें ध्यान 
छिपाये मन में कितने राज
छवि स्पष्ट नयन के पास 

कृते अंकेश

मैं तुम्हारी हू चमक
या कि मैं अपनी खनक
या जुड़ी तुझसे कही
या कि तेरा सार हू
लोग कहते हैं मुझे
तेरा अधूरा प्यार हूँ
तुम मुझे देखा करो
या कभी सोचा करो
जोड़कर मुझको कभी
खुद को जो मोड़ा करो
बस उसी पल तक तुम्हारे
साथ मैं हर बार हूँ
लोग कहते हैं मुझे
तेरा अधूरा प्यार हूँ

कृते अंकेश

कहने को तो सड़क जोड़ती इस मिट्टी को उस मिट्टी से
पर कितने ही खेत तोड़ती इस मिट्टी से उस मिट्टी के
इन्ही रास्तो से जाता है उन शहरो का माल तमाम
लूट खसोट या साम दाम हो बिकता है बस यही किसान
फिर भी सींच रहा वो मिट्टी अपने श्रम के पानी से
मिल पायेगा उसको क्या कुछ अबकी इस राजधानी से

कृते अंकेश

कभी कभी स्पष्टता दुखो को बढ़ाती है
इसीलिए कुछ चीज़े अस्पष्ट ही बेहतर है
जैसे कि बेहतर है कुछ लोगो का मानना कि
ईश्वर है, स्वर्ग है और पुनर्जन्म की अवधारणा
और इस बहाने गरीबी के सारे दुखो को भूल जाना

कृते अंकेश
हैं कोई जिसे यह दिल 
चाहता है हर घड़ी 
दूर पास न पता 
हैं कहाँ वो अजनबी 
बस अधूरी याद ले
बढ़ रही हैं जिन्दगी 
इंतजार है इसे 
फासला मिटे कभी 

कृते अंकेश

Thursday, January 30, 2014

बह जाने दे मन के बंधन 
खुलने दे सीमाओ को 
आज निकल ओ नीर की बदली 
भिंगो दे मेरे जीवन को 

नहीं सकूंगा और टूट में 
कितना जीवन छूट गया 
मुझ तक आते आते फिर से 
भाग्य सितारा रूठ गया 

यहाँ शिकायत किससे कैसी
कौन यहाँ पर दोषी है
सबका अपना मार्ग यहाँ है
राह कोई न छोटी है

कृते अंकेश

Tuesday, January 28, 2014

ओ चिड़िया 
जरा बता दे मुझको भी 
कैसे है उड़ना 
देख सकू अपने पंखो को 
पहचानू किससे है जुड़ना 
सिखा हवा मुझको अब बहना 
कहना अपने अंतर को 
उड़ा साथ में ले जाऊ जो 
सपना सात समंदर को 
रंग बिरंगी तितली मुझको 
भर दे अपने रंगो से
लेकर सपने उड़ू में जिससे
उम्मीदो के पंखो से

कृते अंकेश

मेरी नाराजगी  में
मेरे शब्द बन जाते है गलतिया
लेकिन मेरी ख़ामोशी ले जा सकती है
उन्हें बहुत दूर तक
इसलिए मेरे दिल
बोल खुल के बोल
जबकि तू नाराज़ है

कृते अंकेश

Wednesday, January 22, 2014


बच्चे चंचल होते है
वह ज्यादा देर तक ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते है
क्यूंकि उनके पास इतना समय ही नहीं होता है
बचपन काफी तेज़ी से निकलता है
बच्चे लेटते हुए घिसटते है,
घुटनो चलते है, खिसकते है, सँभलते है
और फिर दोनो पैरो से चलने  लग जाते है
कितना कुछ बदलता है
और फिर शेष जीवन यही घिसा पिटा क्रम चलता है

कृते अंकेश

Sunday, January 19, 2014


साहित्य और में

 साहित्य शायद मुझे विरासत में मिला है, मेरी माँ ने अपना स्नातक साहित्य में किया, तो वही मेरे पिताजी एक अभियंता के साथ साथ एक मझे हुए कवि है।बचपन से ही मुझे चयनित साहित्यिक पुस्तको से भी परिचित करवाया गया, लेकिन मेरी  साहित्यिक अभिरुचि को बढ़ाने में आगरा के राजकीय पुस्तकालय का एक विशिष्ठ योगदान है, यह  पुस्तकालय मेरे स्कूल के ठीक सामने था और मात्र १०० रुपया इसकी आजीवन सदस्यता होने के कारण इसका सदस्य बनना मुश्किल भी न था, इस पुस्तकालय में एक बड़ा हाल था जिसमे २०० से अधिक अलमारिया थी एवं विभिन्न विस्तृत विषयो पर पुस्तके उपलब्ध थी।  प्रत्येक  सदस्य दो पुस्तके अधिकतम १४ दिन के लिए अपने  घर ले जा सकते थे।   उस समय मैं १० या ११ साल का था और मेरे लिए इतनी पुस्तको में से एक या दो  पुस्तको को चुनना आसान  काम नहीं होता था,  पता नहीं क्यो लेकिन मैं उस हाल में से वही पुस्तके ले जाना चाहता था जो न तो इतनी  लम्बी हो कि चौदह दिन में खत्म ही न हो सके और न ही इतनी छोटी या फिर बोरिंग हो  कि मुझे फिर से इस हाल में बापिस आना पड़े, सामान्यत: मुझे पुस्तको के चयन में अत्यधिक समय लगता था, दो से तीन  घंटे या और भी ज्यादा और किसी विशेष पुस्तक को चयनित करने से पहले में न जाने कितनी पुस्तको के कितने  पन्ने पढ़ चुका होता था, धीरे धीरे वह अलमारिया, उनकी पुस्तके, उन पुस्तको के विषय  मेरी स्मृति में चिन्हित होते चले गए, इसी पुस्तकालय में एक दिन मेरे हाथ हरिशंकर परसाई जी की किताब लगी,  मैंने तब तक उनका नाम नहीं सुना था लेकिन  उनके सटीक व्यंग एवं कटाक्षो में मुझे साहित्य की जादुई क्षमता का परिचय मिला,  मेने उसके बाद नए नए लेखको की कहानिया पड़ना शुरू किया , विशेषत: कहानी संग्रह जो भिन्न भिन्न क्षेत्रो के लेखको की प्रमुख कहानियो का संग्रह होते है। साहित्य का यही सम्बन्ध मेरी शब्दावली को विकसित करने में मुख्य योगदायी है, लेकिन अभी तक यह सम्बन्ध मात्र गद्य से ही था, पद्य से में उतना ही परिचित था जितना कि एक सामान्य छात्र होता है । विद्यालय में होने वाली वाद विवाद प्रतियोगिताओ ने मुझे अपनी साहित्यिक क्षमताओ को प्रदर्शित करने का मौका दिया, इन प्रतियोगिताओ में मैं  मुख्यत: विषय के विपक्ष में ही बोलता था और शायद यह मेरे व्यवहार का एक हिस्सा भी बन गया, में आज भी किसी भी विषय का प्रतिरोध उतनी ही आसानी के साथ कर सकता हूँ जितना कि मुश्किल से उसका समर्थन। लेकिन साथ ही वाद विवाद प्रतियोगिता ने मुझे एक और चीज़ भी सिखायी, वह थी, अपने और अपने  विपक्षी के  सभी पक्षो का निष्पक्ष आकलन । क्यूंकि किसी भी विरोध को सुदृढ़ तरीके से करने के लिए आपको वस्तुस्थिति का ज्ञान होना अत्यतन्न आवश्यक है, चाहे फिर आप विषय के किसी भी पक्ष में हो। जब में  कक्षा ९ या १० में था, विद्यालय ने एक वार्षिक पुस्तिका निकालने का निर्णय लिया, मुझे इसका छात्र सम्पादक बनाया गया, और यही मैंने अपनी पहली कविता इसी पुस्तिका के लिए लिखी। सपना शीर्षक पर लिखी यह कविता आज भी मेरी पसंदीदा है एवं शायद मेरे सभी परिचितो ने इसे मुझसे अवश्य ही सुना होगा । कविताओ का यह क्रम मुझे गद्य से पद्य की और लेकर चला गया और मुझे पद्य लिखना गद्य  लिखने से कही अधिक आसान लगने लगा , यद्यपि में समय समय पर गद्य लिखने का प्रयत्न करता हूँ लेकिन उतनी आसानी से नहीं लिख पता जितना कि कवितायेँ लिख सकता हूँ ।

कृते अंकेश

Saturday, January 18, 2014

प्रेम प्रतिबन्ध 
असीमित सम्बन्ध 
घायल ह्रदय 
मृत शरीर 
ख्याति 
बह गया सब कुछ पानी के जैसे 
अखबारो की सुर्खियो में 

कृते अंकेश
जनता त्रस्त हो चुकी थी, भ्रष्टाचार और बलात्कार की खबरो से अखबार रंगे पड़े थे, ऐसे में उस बूढ़े से दिखने वाले आदमी ने जब आवाज़ उठायी, धरना प्रदर्शन किया, अनशन किया, तो लोगो में फिर से विश्वास जगा, सारा देश उनके साथ लामबद्ध हो गया, चुनाव हुए और सरकार को उठा फेका गया, नए प्रतिनिधि आये, लोगो ने चैन की सांस ली, पर फिर से अखबारो में वही समाचार, फिर से बलात्कार , लोग चिल्लाने लगे, सरकार ने कहा हम आवाज़ उठाएंगे, धरना प्रदर्शन करेंगे, लोगो में विश्वाश जगा या नहीं यह पता करवाया जा रहा है 

कृते अंकेश
मृत्यु श्रापित है 
जीवन से न मिलने के लिए 
जीते है लोग मृत्यु से अनभिज्ञ 
जबकि देती है वो पहरा जीवन के छोर पर 
कहते है कुछ लोग मृत्यु को भी चकमा देते है 
आसान नहीं होता है मृत्यु के लिए हर बार जीवन के पास आना 
इसीलिए करती है वो इंतज़ार टूटती साँसो का 
और करती है छिपकर वार 

जीवन मात्र शरीर नहीं 
जीवन आपका अस्तित्व है
जब तक यह अस्तित्व शारीरिक है
यह क्षयित होता रहता है
और एक दिन मृत्यु इसको अपना भोग बना लेती है
लेकिन मनुष्य को सामर्थ्य है अपने अस्तित्व को शारीरिक से वैचारिक बनाने की
और विचार तो अमर है
मृत्यु क्या समय भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते
बस इसी तरह कुछ लोग अमर हो जाया करते है

कृते अंकेश

Friday, January 17, 2014


मेरे हॉस्टल कि बिल्ली कितनी भाग्यशाली है
घूमती है इधर से उधर, जाती है जहा करता है उसका मन
आ जाती है कभी कभी मेरे पास भी जब ऊब जाती है बाकि सभी चीज़ो से
नहीं देखा मैंने उसे कभी ठहरते हुए एक जगह
चल पड़ती है हर अगले पल एक नए मिशन की खोज में
मुझे याद है बचपन में एक बिल्ली मेरे घर में आकर दूध पी जाती थी
और माँ कभी कभी मुझे बोल कर जाती थी
दूध गर्म है फ्रिज में रखने से पहले ठंडा होने रखा है
देखते रहना बिल्ली नहीं आ जाये
उस दोरान मुझे काफी कुछ पता लगा बिल्लियो के बारें में
कितनी सतर्क रहती है शिकार करते हुए
और कितना डरती है वह पानी के स्पर्श से
उनके पास तक दुश्मन बनकर जाना उतना ही मुश्किल है
जितना आसान दोस्त बनकर उनके नजदीक आ जाना है
बिल्ली पर भरोसा करना आपकी सबसे बड़ी भूल हो सकती है
लेकिन बिल्ली आपको कभी नहीं भूलती है
वह फिर से कभी कभी पुरानी जगहो पर लौट आती है
और अगर कही राह में मिल जाये तो म्याऊ कहकर आपको अपनी याद दिलाती है

कृते अंकेश

कुछ दिन और दिनो से बेहतर
कुछ दिन और दिनो से हल्के
कुछ दिन खाली,कुछ दिन पूरे
कुछ दिन बीते ढलते ढलते

कुछ दिन  खोये ख़ामोशी में
कुछ दिन महके और ख़ुशी में
कुछ दिन फिर अलसाये सोये
कुछ दिन बस सपनो में खोये

कुछ दिन लाये याद सुनहरी
कुछ दिन बांधे बातें गहरी
कुछ दिन साथ हक़ीक़त लाये
कुछ दिन दिन का मूल्य बताये

कृते अंकेश