Tuesday, August 27, 2013

अँधेरा


दिन भर थक हार के बैठी
राह जोतती जाने किसकी
सांझ भी लो न लायी संदेसा
छाया रहा अँधेरा कैसा

उड़ते रहे पतंगे फेरे
पक्षी बापिस घर के डेरे
जग अपनी रातो को सजाता
उसके पथ कोई न आता

सोचे नयन पलक को डारे
उसकी छवि को पास बुला ले
लेकिन पलके खोल ज्यो आती
छाया घना अँधेरा पाती

कृते अंकेश

Saturday, August 17, 2013

कुछ भी तो नहीं बदला 


कुछ भी तो नहीं बदला
आती है सूरज की  किरणे
करती थी जगमग जो इस घर  को
चौका  जाती है अब मुझ को
पवन उडाती जो केश  तुम्हारे
अब परदो से खेला करती है
थक जाती है जब उनसे
सामान बिखेरा करती है
शायद वो नाराज़ है कुछ
या कुछ तो उसका बदला है
में तो पहले जैसा ही हूँ
कुछ तनहा और कुछ अकेला हूँ
चिडियों के छोटे बच्चे
तुमने जिनको दाना डाला था
आ जाते है भूले भटके न जाने क्यों
जब न कुछ है उनको खाना
 उनकी आँखे अब भी शायद तुमको ही तकती है
कुछ भी तो नहीं बदला

कृते अंकेश

Monday, July 01, 2013

आंसू

आंसूओ  में पिघलती है बर्फ कही  की 
झरती है यादें गरजती बरसती 
उभरते है  नैना कालिमा  को ढाके 
इन पहाड़ो में कहा कोई झाके 

कृते अंकेश 

SCHOOL

मेरे स्कूल में 
दो रस्ते थे आने के 
सेकड़ो रस्ते थे जाने के 
दीवारे खीची जाती थी 
लेकिन अनेको बार तोड़ दी  जाती थी 
क्लास तो हमने कहा कहा नहीं लगायी 
स्कूल को आने वाली हर सड़क 
हमने ही सजाई 
पड़ने से ज्यादा वहा  न पड़ने के बहाने थे 
छात्र खेलकूद  के शौक़ीन और शिक्षक अपनी ही  धुन में दीवाने थे 
स्कूल सरकारी था 
ताज्जुब नहीं की यह हाल था 
पर फिर भी भइया  स्कूल अपना मिसाल था 
यहाँ के गुरुजनों की शिक्षण शैली 
सदा रंग लायी 
शायद ही हो कोई ट्राफी या मैडल 
जो अपने स्कूल न आई 

कृते अंकेश 

Sunday, June 30, 2013

कुछ बूंदे बारिश की घुलकर
एक पहचानी बस्ती से मिलकर
बीता बचपन खोल रही है
और समय को मोड़ रही है 
इन्ही फ़ुहारो सा था बचपन
उछल बिखर कर बीता हर दिन
भीगा तन मन भीगा बचपन 
बचपन की बारिश की यादे
बरस रही है हल्के हल्के
हल्के हल्के हल्के हल्के
खोल रही है तोङ रही है
कुछ परतो को जोङ रही है
घुलकर बारिश की कुछ बूंदे
आज समय को मोड़ रही है

कृते अंकेश

Friday, June 28, 2013

या तो चलने  का मौका दो
या फिर जलने  का मौका दो
कब तक होगी यह रात प्रखर
कब तक अश्रु विप्लव यह शहर
कब तक उमडेगा इन्कलाब
कब तक जीवित है शेषनाग
कब तक चमकेंगे तुच्छ स्वर
कब तक खनकेंगे चंद महर
उड़ता जायेगा यह विषाद
कर दो जाकर अब शंखनाद
है प्रहर यही है घडी यही 
जो हुआ अभी नहीं तो कभी नहीं

कृते अंकेश 
जुड़ते गए 
उड़ते गए 
सपने मेरे खुलते गए 
पंख भरे अपनी उड़ान 
आँखे समेटे एक आसमान
तारो सी हो  दुनिया जिधर 
खिलते हो चेहरे हर एक पल 
पाना वो मंजिल मेरा मुकाम 
ख़त्म नहीं होगा तब तक यह काम 

कृते अंकेश  

Tuesday, March 26, 2013

भर पिचकारी देखो चली रे सवारी 
छूटा जाये न कही कोई अंग 
आज रंगों से सजा दो सारे भेद मिटा दो 
देखो बन जाये सभी एक रंग 
इन्द्रधनुषी रंगों की फुहारों में 
भींग रहा जीवन 
तन को भुला के आज मन को मिला लो 
देखो रंगों का मौसम 
भीनी है खुशबू पकवान सजेंगे 
और रंगेंगा आँगन 
तन भी मिलेंगे मन भी मिलेंगे 
आया रंगों का सावन 

 कृते अंकेश 


Monday, March 25, 2013

चौखट छूटी पर्दा उछला 
माथे ने बिंदिया भी छोड़ी 
हाथो ने कंगन को छोड़ा 
रीति रिवाज की बेडी टूटी 
इतनी आज़ादी पाने में 
जाने कितनी सदिया गुजरी 
भूल रहे जो घूँघट को रखते 
परदे में बस चीज़े छिपती 

कृते अंकेश
जानता हूँ तुम्हे जाना होगा 
स्वप्न है तुम्हारे जिन्हें तुम्हे पाना होगा 
नहीं रोकूंगा तुम्हे करके इंतज़ार 
या कुछ ऐसा जो ला सके ठहराव
मद्धिम पंक्तिया सर झुकाए देंगी विदाई 
और तुम चली जाओगी जैसे एक दिन थी आई 

कृते अंकेश
एक दिन अक्ल मुझ पर कब्ज़ा कर लेगी 
तोड़ सपनो का महल निकाला जायेगा मुझे बाहर 
सम्पादकीय लेखको की तरह में भी करने लगूंगा गंभीर विमर्श 
बंधित हो जाएगी मेरी कलम 
तोड़ दिए जायेंगे मेरे शब्द 
लेकिन तब तक में लिखता रहूँगा स्वतंत्र 
उन्मुक्त हृदय में आए हर विचार को 
बस इसी तरह

कृते अंकेश
नफरत 
रिश्तो की मीनार ढहा दे 
चाहे तो यह पल भर में 
लाशो के अम्बार लगा दे 
चाहे तो यह पल भर में 
रच जाये इतिहास निराला 
चाहे तो यह पल भर में 
और पिला दे विष का प्याला 
चाहे तो यह पल भर में 

भावो को भी शून्य बना दे
चाहे तो यह पल भर में
मुस्कानों का रंग उड़ा दे
चाहे तो यह पल भर में
मैं और तू क्या चीज़ है साकी
यह दुनिया एक प्याला है
नफरत से इसको भर दे तो
प्रलय मचा दे पल भर में

कृते अंकेश
शहर भर की उदासी भी 
जब मायूस हो जाती 
तेरे चेहरे को तकती है 
वही रोनक है पा जाती 

Saturday, March 16, 2013



काश ऐसा होता 
कि उलझे बालो वाली वह छोटी लड़की 
खड़ी  हुई उस फुटपाथ पर 
तकती रही आने जाने वाले चेहरे 
पा सकती जो मन में होता 

काश ऐसा होता 
कि सारे दिन मेहनत करता 
उनके गोदामों को भरता 
जब कोई श्रमिक  घर तक पहुचता 
खुशियों से उसको भी भर सकता 

काश ऐसा होता 
नन्हा बचपन 
आसमान को ताक रहा मंत्रमुग्ध हुआ जब 
पा सकता हर उस सपने को 
जो उस पल दिल में होता 

काश ऐसा होता 
भोजन  की सुगंधे 
पेट की  भूख पहचाना करती 
क्षुदा से पीड़ित नहीं शेष फिर 
रहा कोई भी तन होता 

काश ऐसा होता 
कि शब्दों को रच देने भर से 
यह सब कुछ हो सकता 

कृते अंकेश 

Sunday, March 10, 2013

क्या बताओगे फर्क क्या है 
उम्मीद और इंतज़ार में 
मुझे नहीं पता में तो कर रहा हूँ इंतज़ार 
और खो गया हूँ उम्मीदों के जाल में 

कृते अंकेश

Saturday, March 09, 2013

विघ्न को जो ढूंढता वो  विघ्न का तारक कहा 
 मृत्यु का जो मार्ग रचता पथ प्रदर्शारक कहा 
क्षोभ है न है   क्षमा क्या  अनुसरण उसका करे 
काल से जो न डरा क्या भला उसको कहे 

है नहीं जीवन अनेको मृत्यु भी बस एक है 
एक है अवसर  यहाँ, एक ही जो शेष है 
इतिहास रचते है वही जो न डरे है काल से 
मृत्यु को रखते सिरहाने विघ्न मिटाते भाल से 

क्षोभ उनको है नहीं थे सदा स्पष्ट जो 
और क्षमा संभव नहीं जब चल पड़े दुर्गम पथो को 
अब तो तय करना समय को जीत है या हार है 
शेष श्वासे भी रहेंगी या शेष मात्र संसार है 

कृते अंकेश 

Sunday, February 24, 2013

परिधियो  में बीत  रहे थे स्वप्न
खीचते सीमाएं  बार बार
उभरते बादल नभ के श्वेत
बरसते बेबस हो हर  एक बार

श्याम था तेरे नयनो का रंग
निशा ने छीना वर्ण विकार
मधुर अधरों के बिखरे पाश
सजाये  शहर तेरा है आज

ढूंढता में जिसको हर पल
छवि  मधुरित  जिसका विस्तार
कही  खोयी स्वप्नों में रही
 रहा  उन स्वप्नों का इंतज़ार

कृते  अंकेश 

Friday, February 22, 2013

गलिया भागती रही
रास्ते बदलते  रहें
लोग मिलते और बिछुड़ते रहे
शहर  ने भी सीख लिया फिर
धीरे धीरे बदलना
व्यर्थ है
यहाँ  इंतज़ार करना
अब  चकाचौंध में शहर की
थम रही भीड़ भी 
ढूंढती आँखे  वही
जो हुई कभी  दूर  थी 

कृते  अंकेश

Monday, February 11, 2013

तकदीर अगर यह कह दे मुझे 
तस्वीर तेरी मंज़ूर नहीं 
आँखों की चमक साँसों की दमक 
इनका अब कोई दस्तूर नहीं 
में फितरत फिर भी रखता हूँ 
अपने ही सहारे आऊंगा 
सपने देखे है बरसो से 
उनको में खुद ही सजाऊंगा 
वो कहते है इन गलियों में 
मेरे कदमो की गूंज नहीं 
आते है लोग हजारो में 
मेरा उनमे कुछ मोल नहीं 
मुझको उनसे न शिकायत है 
न उनको मेरी जरूरत है 
मेरी हस्ती है छोटी सी 
और पाक यह  मेरी मुहब्बत है 
 
कृते अंकेश 

Sunday, February 10, 2013

यु तो बहुत  आएँगी रातें 
बहुत आयेंगे सपने 
पर शायद उनसे से कुछ ही 
बन पाएंगे अपने 
यही सोच कर अभी में दिन दिन 
रात रात भर सोता 
शायद मिल जाये वो सपना 
जो सच है हो सकता 
फिर दुनिया मुट्ठी में होगी 
सुन लो मेरी बात 
बदल जाएगी तक़दीर भी मेरी 
उस सपने के साथ 

कृते अंकेश