स्याह छवि को बना दे उजाला
चिरागो को इतनी फुरसत कहा है
Friday, October 08, 2010
Sunday, October 03, 2010
Wednesday, September 29, 2010
Tuesday, September 28, 2010
Tuesday, September 21, 2010
जब चिड़िया चुग गयी खेत
.बारिश होते होते काफी देर हो चुकी थी .....कहने को तो शाम के सात ही बजे थे, लेकिन लग रहा था मानो रात की बेला भी ढलने को आ गयी हो . पापा भी कितनी बार बोले थे बेटा कल चले जाना ..... आज मौसम कुछ ठीक नहीं है. पर जवान जोश के आगे उम्र का रौब कहा टिकता है. हम भी डट कर बोले, कोई लड़की थोड़े ही है, जो कोई उठा कर ले जायेगा ....... अब भुगतो, उठाने का तो पता नहीं, लेकिन अगर बारिश न रुकी तो यह पानी तो पक्का हमें बहा कर ही छोड़ेगा. यहाँ आस पास कोई घर या ठोर ठिकाना भी तो नज़र नहीं आ रहा है . हे इन्द्र देवता कुछ तो रहम करो, में सारे जीवन आपके उपकारो को नहीं भूलूंगा , अरे यहाँ तक की इतनी गारंटी भी देने को तैयार हू कि मेरी बस्ती में किसी को आपकी गद्दी की और आँख तक उठाने नहीं दूंगा, भगवन बस यह बारिश रोक लो. यह क्या, प्रार्थना का असर तो कुछ उल्टा ही मालूम होता है ...... बारिश की तीव्रता समय के साथ बढती ही जा रही है . छोटे छोटे गड्डे भी सागर को पछाड़ने के लिए जोर शोर से लगे हुए है, नालियो की सीमा विजयी दल की भाति परिवर्तित होती जा रही है. यहाँ तक की कुछ नालिया तो नयी नवेली दुल्हन की तरह इठलाती हुई चलने लगी है . कचरे की भी आज उड़ कर लगी है , मुफ्त में नदी की सैर जो कर रहा है. अब तक सुरक्षित बची मेरी सैन्य चौकी भी अब बारिश के बहाव का शिकार होने के कगार पर आ गयी. कहा जाता है दुश्मन को अगर तोडना है तो सबसे पहले उसकी जड़ो को तलाशो. एक बार अगर जड़ हाथ में आ गयी, फ़तेह तो खुद बखुद हो जाएगी . काल देवता भी आज समूल विनाश के इरादे से ही आये है. पानी के जोर से मेरे आस पास की मिट्टी भी तेरती हुई सागर से मिलने निकल पड़ी. अब तो अतीत के चित्र आँखो के सामने से गुजरने लगे. जब में छटवे दर्जे में था, मुझे तैराकी सीखने की बड़ी इच्छा होती थी. लेकिन मन की इच्छाओ को प्रधानता मिलती ही कहा है , कभी साल दो साल में अगर कही जिक्र छिड गया तो याद आ उठता था, वर्ना फिर से यह आशा मन के किसी कौने में दब कर बैठ जाती थी. लेकिन आज वाकई खुद पर अफ़सोस हो रहा है, अगर कभी अपनी इच्छाओ को जरा भी प्रधानता दी होती तो आज जान पर बन आने की नौबत तो नहीं आती. लेकिन अब पछताए क्या होत जब चिड़िया चुग गयी खेत.
.बारिश होते होते काफी देर हो चुकी थी .....कहने को तो शाम के सात ही बजे थे, लेकिन लग रहा था मानो रात की बेला भी ढलने को आ गयी हो . पापा भी कितनी बार बोले थे बेटा कल चले जाना ..... आज मौसम कुछ ठीक नहीं है. पर जवान जोश के आगे उम्र का रौब कहा टिकता है. हम भी डट कर बोले, कोई लड़की थोड़े ही है, जो कोई उठा कर ले जायेगा ....... अब भुगतो, उठाने का तो पता नहीं, लेकिन अगर बारिश न रुकी तो यह पानी तो पक्का हमें बहा कर ही छोड़ेगा. यहाँ आस पास कोई घर या ठोर ठिकाना भी तो नज़र नहीं आ रहा है . हे इन्द्र देवता कुछ तो रहम करो, में सारे जीवन आपके उपकारो को नहीं भूलूंगा , अरे यहाँ तक की इतनी गारंटी भी देने को तैयार हू कि मेरी बस्ती में किसी को आपकी गद्दी की और आँख तक उठाने नहीं दूंगा, भगवन बस यह बारिश रोक लो. यह क्या, प्रार्थना का असर तो कुछ उल्टा ही मालूम होता है ...... बारिश की तीव्रता समय के साथ बढती ही जा रही है . छोटे छोटे गड्डे भी सागर को पछाड़ने के लिए जोर शोर से लगे हुए है, नालियो की सीमा विजयी दल की भाति परिवर्तित होती जा रही है. यहाँ तक की कुछ नालिया तो नयी नवेली दुल्हन की तरह इठलाती हुई चलने लगी है . कचरे की भी आज उड़ कर लगी है , मुफ्त में नदी की सैर जो कर रहा है. अब तक सुरक्षित बची मेरी सैन्य चौकी भी अब बारिश के बहाव का शिकार होने के कगार पर आ गयी. कहा जाता है दुश्मन को अगर तोडना है तो सबसे पहले उसकी जड़ो को तलाशो. एक बार अगर जड़ हाथ में आ गयी, फ़तेह तो खुद बखुद हो जाएगी . काल देवता भी आज समूल विनाश के इरादे से ही आये है. पानी के जोर से मेरे आस पास की मिट्टी भी तेरती हुई सागर से मिलने निकल पड़ी. अब तो अतीत के चित्र आँखो के सामने से गुजरने लगे. जब में छटवे दर्जे में था, मुझे तैराकी सीखने की बड़ी इच्छा होती थी. लेकिन मन की इच्छाओ को प्रधानता मिलती ही कहा है , कभी साल दो साल में अगर कही जिक्र छिड गया तो याद आ उठता था, वर्ना फिर से यह आशा मन के किसी कौने में दब कर बैठ जाती थी. लेकिन आज वाकई खुद पर अफ़सोस हो रहा है, अगर कभी अपनी इच्छाओ को जरा भी प्रधानता दी होती तो आज जान पर बन आने की नौबत तो नहीं आती. लेकिन अब पछताए क्या होत जब चिड़िया चुग गयी खेत.
Thursday, September 16, 2010
Saturday, September 11, 2010
अंत
ढूंढ रहा अपनी परछाई
खुद से भी अनजान हुआ
बीत गए सुख दुःख के साए
गम भी अब वीरान हुआ
भटक रहा हूँ अंधियारे में
आशाएं भी लुप्त हुई
जीवन की यह शेष स्वांस भी
अंतपूर्व ही मुक्त हुई
किसी रोज़ और किसी मोड़ पर
जो पैगाम मिले कोई
कह देना यह रात गयी
लाने एक प्यारी सुबह नयी..........
कृते अंकेश
ढूंढ रहा अपनी परछाई
खुद से भी अनजान हुआ
बीत गए सुख दुःख के साए
गम भी अब वीरान हुआ
भटक रहा हूँ अंधियारे में
आशाएं भी लुप्त हुई
जीवन की यह शेष स्वांस भी
अंतपूर्व ही मुक्त हुई
योग वियोग सीमाएं छूटी
काल विकाल रची वसी
शून्य सरोवर में बहती यह
काया ही अब शेष बचीकिसी रोज़ और किसी मोड़ पर
जो पैगाम मिले कोई
कह देना यह रात गयी
लाने एक प्यारी सुबह नयी..........
कृते अंकेश
Sunday, September 05, 2010
सत्य
कुछ बदला सा पाया है
धुंधलापन गायब है
हर दृश्य उभर कर आया है
झूम रहे तरुपत्र सामने
पक्षी सुर में गाते है
सावन बीत गया है फिर भी
बादल गीत सुनाते है
बहती मादक पवन सयानी
शीतलता को चूम रही
फुटपाथो पर बिखरी छाया
आज खुशी से कूद रही
रहने दो बस यही छवि
क्या परिवर्तन स्थायी है
छाया धुंधलापन आँख खुली
यह सपना भी अस्थायी है
Saturday, August 28, 2010
प्रवाह
सेकड़ो घर ले समेटे काल बन संकट है छाया
आंसूओ की क्या कमी थी
जल का यह सागर बहाया
या सचमुच मनुष्य ने प्रकृति को इतना रुलाया
तीव्र विस्तार से जल की धारा जो चली
लग रहा मानो भोगोलिक सीमाएं सारी घुल चली
एक है दुनिया हमारी
अस्तित्व अपना एक है
आओ मिटाये दूरिया यह मनुष्य अभी शेष है
Saturday, August 14, 2010
Saturday, July 31, 2010
स्वप्न
चल देते है कभी
चल देते है कभी
अचानक से
अनजानी राहों पर
मंजिलो की तलाश में
समझते है
कभी समझाते है
या कभी शायद समझ कर भी
बहक जाते है
टकराते है टूटते है
उम्मीदों से झूझते है
बहता है मन
मानो कटी पतंग
चंचलता बढती है
लहरों की तरह
कुछ तासीर ही ऐसी है
या ख्वाबो का करिश्मा
जीनी है वो दुनिया
जो में बुनता रहा हूँ
बीत चला अरसा
क्यों चुप में खड़ा हूँ
यह शोर है कैसा
कैसी है हलचले
यह ख्वाब है बीता
या स्वप्न भवर है
टिक टिक घडी की
निरंतर चल रही
चंद निगाहे
बस लक्ष्य तक रही
उम्मीद है रचेंगे
इक नया फ़साना
हो स्वप्न ही भला
यह कर है जाना
Sunday, July 25, 2010
अवसरों को ढूढना
में यहाँ सुदूर में
करना बहाना प्यार का
बीत जाएगी बहार
खो न जाना यार
फिर बजे जो बांसुरी
ताल छेड़े जो मृदंग
सोचना है सामने
फिर वही संसार
देख मेघराज को
खिलने लगे जो मन मयूर
करना नियंत्रित कामना
है चंचलता पाश
बारिशो की बूँद को
गिरने न देना ओष्ठ पर
छल जायगी घटा
वियोगी बयार
में यहाँ सुदूर में
शांत छंद रच रहा
मेरी कवित्व साधना
है तेरा इंतज़ार
आदित्य ने आभा को पिघला आज है बरसा दिया
ग्रीष्म ने भी शीर्ष पर रहने को है तय किया
जीवन लगा पिघलने स्वेद की बूदो तले
वाष्प बन धरा का सारा नीर भी जाता रहा
चल रही पवन भी आज पूरे जोर शोर से
बरसा रही अनल की धार आसमा के छोर से
तपती तपस्या जून की है इन्द्र ने भी सुन रखी
लापता है मेघराज बढती घटा रविन्द्र की
धार जमुना की गई सिकुड़ सर्प रेख सी
चल रही पवन भी आज पूरे जोर शोर से
बरसा रही अनल की धार आसमा के छोर से
तपती तपस्या जून की है इन्द्र ने भी सुन रखी
लापता है मेघराज बढती घटा रविन्द्र की
धार जमुना की गई सिकुड़ सर्प रेख सी
व्याकुल हुई धरा तकती राह मेघ की
आ चला आषाण लेकिन ताप तेवर तीव्र है
जीवन गया सिमट चढ़ा प्रदूषण की भेट है
आ चला आषाण लेकिन ताप तेवर तीव्र है
जीवन गया सिमट चढ़ा प्रदूषण की भेट है
Thursday, July 22, 2010
Saturday, June 26, 2010
समर
यह समर मिलन है सीमा का
हर घाव यहाँ धुलते हैं
जब रक्त यहाँ बहता हैं
माटी से रिसता हैं
जाता हैं उस पार वहा
जहा एक वीर है और ढहा
माटी करवाती आलिंगन
चूमा करती हर कण से कण
यह रक्त नहीं आंसू है
जो धरती आज है रोती
खोये है दो वीर पुत्र
कैसे खुश हो सकती
फिर जस्न मना यह कैसा
यह कौन बजाये तुरही
यह किसने खीची सीमा
यह किसकी संसोधित संधि
यह समर मिलन है सीमा का
हर घाव यहाँ धुलते हैं
जब रक्त यहाँ बहता हैं
माटी से रिसता हैं
जाता हैं उस पार वहा
जहा एक वीर है और ढहा
माटी करवाती आलिंगन
चूमा करती हर कण से कण
यह रक्त नहीं आंसू है
जो धरती आज है रोती
खोये है दो वीर पुत्र
कैसे खुश हो सकती
फिर जस्न मना यह कैसा
यह कौन बजाये तुरही
यह किसने खीची सीमा
यह किसकी संसोधित संधि
बेवफा
शायर क्या है वफ़ा
यह मौत सिखा जाती है
दो कदम बहुत ज्यादा है
पल भर में ले जाती है
वो तो हँसते थे चलते थे
यह चुपके से आती है
वो जाने पहचाने थे
यह अनजानी ले जाती है
हम सफ़र कहो या दीवाना
यह वफ़ा निभाती है
आती है ले जाती है
मझधार में न तड़पाती है
है इश्क मुझे हर पल से
दिल तक जब रहता है
सोचा जो इसने पल भर
मतलबी बना कहता है
हम बड़े हैं शायर कलम हमारी
वो बेवफा नारी
जो थी जानी पहचानी
और यह मौत मिली अनजानी
Wednesday, June 23, 2010
Saturday, June 19, 2010
समर्पण
उस क्षण मुझको विश्राम कहा
आनंद भी हैं अविराम नहीं
सीमा अब तक अपरिभाषित सी
बिखरी आशा अनजान यही
मुझको उत्तर की चाह नहीं
मेरे प्रश्नों का मोल यही
जीवन मेरा संग्राम सा हैं
पाने की इसमें आस दबी
कुछ पल गुमसुम ही रहने दो
ख़ामोशी तोड़ी जाएगी
बरसो से ख्वाब सजाया है
तस्वीर भी मोड़ी जाएँगी
अश्रु भी अवसान नहीं
जीवन भी अंत नहीं होगा
यह क्रम सदा चलता आया
मुझसे विचलित न कल होगा
यही समर्पण पाया था
मैं यही समर्पण दे जाऊँगा
मैं आज समर्पित होता हूँ
कल यही समर्पण चाहूँगा
Wednesday, May 19, 2010
मेरे कुछ ख़ास साथियो को समर्पित
रात गुजर सी चली गयी
आने वाले कल की यादे
फिर माथें में उभर रही
स्वप्निल स्वरित स्वयंभू काया
स्वप्नों की यह चंचल छाया
स्वप्न सरोवर सुधा प्रवाहित
आज सृजन को उभर रही
छोड़ चला मैं आज स्वयं को
स्वप्न नया एक पाने को
कदम उठाये आज है मैंने
दुर्गम पथ अपनाने को
Sunday, April 04, 2010
सीमा
जब बारिश की बूंदो ने भी हमसे नाता तोड़ लिया
जब बारिश की बूंदो ने भी हमसे नाता तोड़ लिया
खेतो की हरियाली ने भी गाँव का दामन छोड़ दिया
सुनकर आया तेरे दर पर खुशियो की बारिश होती है
नहीं पता था आंसू बहते और नुमाइश होती है
आज तुम्हारे शहर मैं आकर मैं खुदको ही भूल गया
नहीं पता किस राह चला था और किधर मैं निकल गया
अपनी मिट्टी पर जब हम अनजाने चेहरे पाते थे
उन चेहरों मैं भी जाने कैसे अपनापन खोज ही लाते थे
आज सेकड़ो चेहरो में , मैं खुद को खोया सा पाता हूँ
बस फुटपाथो पर बिखरी भूखी लाशे गिनता जाता हूँ
नही जानता क्यो फिर भी वो गीत खुशी के गाते हैं
क्या वो इतने सीमित है या हम सीमा से बाहर आ जाते हैं
क्या वो इतने सीमित है या हम सीमा से बाहर आ जाते हैं
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