Friday, October 08, 2010

स्याह छवि को बना दे उजाला
चिरागो को इतनी फुरसत कहा है

Sunday, October 03, 2010

अभिनव बिंद्रा लिए तिरंगा
मेजबान दल आया है
करतल अभिनन्दन हर्षनाद से
खेल जगत मुस्काया है
विभिन्न विधाए,  भिन्न अदाए
जंग जीत की तैयारी है
सुदूर देश से  भिन्न भेष में
हर्षित यह नर नारी है

Wednesday, September 29, 2010

शब्दो को ताली मिलती है
पर जैबे खाली मिलती है

Tuesday, September 28, 2010

नन्ही सी आँखो में  पानी भरते देखा हैं
भरी दुपहरी में जीवन को नादानी करते देखा है
चोराहे पर पलता जीवन
कितना आगे जायेगा
बचपन का यह सौम्य पत्र कितने शीत शिशिर  सह पायेगा
रोटी के आगे जीवन से बेईमानी करते देखा है
नन्ही सी आँखो में  पानी भरते देखा हैं

कृते अंकेश

Tuesday, September 21, 2010

 जब चिड़िया चुग गयी खेत

.बारिश होते होते काफी देर हो चुकी थी .....कहने को तो शाम के सात ही बजे थे, लेकिन लग रहा था मानो रात की बेला भी ढलने को आ गयी हो . पापा भी कितनी बार बोले थे बेटा कल  चले जाना ..... आज मौसम कुछ ठीक नहीं है. पर जवान जोश के आगे उम्र का रौब कहा टिकता है.  हम भी डट कर बोले, कोई लड़की थोड़े ही है, जो कोई उठा कर ले जायेगा ....... अब भुगतो, उठाने का तो पता नहीं, लेकिन  अगर बारिश न रुकी तो यह  पानी तो पक्का हमें  बहा कर  ही छोड़ेगा. यहाँ आस पास कोई घर या ठोर ठिकाना भी तो नज़र नहीं आ रहा है . हे  इन्द्र देवता कुछ तो रहम करो, में सारे जीवन आपके उपकारो   को नहीं भूलूंगा  , अरे यहाँ तक की इतनी गारंटी  भी देने को तैयार हू कि मेरी बस्ती में किसी को आपकी गद्दी की और आँख तक उठाने नहीं  दूंगा, भगवन बस यह बारिश रोक लो.  यह क्या, प्रार्थना का असर तो कुछ उल्टा ही मालूम होता है ...... बारिश की तीव्रता समय के साथ  बढती ही जा रही है . छोटे छोटे  गड्डे भी सागर को पछाड़ने के लिए जोर शोर से लगे हुए है, नालियो की सीमा विजयी दल की भाति  परिवर्तित होती जा रही है.  यहाँ तक की कुछ नालिया  तो नयी नवेली दुल्हन की तरह इठलाती हुई चलने लगी है . कचरे की भी आज उड़ कर लगी है , मुफ्त में नदी की  सैर  जो कर रहा है. अब तक सुरक्षित बची मेरी सैन्य  चौकी भी अब बारिश के बहाव का शिकार होने के कगार पर आ गयी. कहा जाता है दुश्मन को अगर तोडना है तो सबसे पहले उसकी जड़ो को तलाशो. एक बार अगर जड़ हाथ में आ गयी, फ़तेह तो खुद बखुद हो जाएगी . काल देवता भी आज समूल विनाश के इरादे से ही आये है. पानी के जोर से मेरे आस पास की मिट्टी भी तेरती हुई सागर से मिलने निकल पड़ी. अब तो अतीत  के चित्र आँखो के सामने से गुजरने लगे. जब में छटवे  दर्जे में था, मुझे तैराकी  सीखने की  बड़ी इच्छा होती थी. लेकिन मन की इच्छाओ को प्रधानता मिलती ही कहा है , कभी साल दो साल में अगर कही जिक्र छिड गया तो याद आ उठता था, वर्ना फिर से यह आशा मन के किसी कौने में दब कर बैठ जाती थी. लेकिन आज वाकई खुद पर अफ़सोस हो रहा है, अगर कभी अपनी इच्छाओ को जरा भी प्रधानता दी होती तो आज जान पर बन आने की नौबत तो नहीं आती. लेकिन अब पछताए क्या होत जब चिड़िया चुग गयी खेत.

Thursday, September 16, 2010

बिखरता हूँ  , बिछुड़ता हू,  बहारो से विसरता हूँ
बना व्याकुल बिना वारि भटकता हूँ तरसता हू
वो बेखुद  सा  बना  बैठा  बरसते बादलो के  बीच
विरह की वेधती ज्वाला सहजता हूँ सहजता हूँ 

Saturday, September 11, 2010

अंत

ढूंढ  रहा अपनी परछाई
खुद से भी अनजान हुआ
बीत गए सुख दुःख के साए
गम भी अब वीरान हुआ


भटक रहा हूँ अंधियारे में
आशाएं भी  लुप्त हुई
जीवन की यह शेष स्वांस भी
अंतपूर्व ही मुक्त हुई


योग वियोग सीमाएं छूटी
काल विकाल रची वसी
शून्य सरोवर में बहती यह
काया ही  अब शेष बची


किसी रोज़ और किसी मोड़ पर
जो पैगाम मिले कोई
कह   देना  यह रात  गयी
लाने  एक प्यारी सुबह नयी..........

कृते अंकेश 

Sunday, September 05, 2010

सत्य 

आज गगन को देखा मैंने
कुछ बदला सा पाया है
धुंधलापन  गायब  है
हर दृश्य  उभर कर आया है

झूम रहे तरुपत्र सामने 
पक्षी सुर में गाते है 
सावन बीत गया है फिर भी 
बादल  गीत सुनाते  है

बहती मादक  पवन सयानी 
शीतलता को चूम  रही  
फुटपाथो  पर बिखरी  छाया 
आज खुशी से कूद रही 

रहने दो बस यही छवि 
क्या परिवर्तन स्थायी  है 
छाया धुंधलापन आँख खुली 
यह सपना भी अस्थायी  है  



  

Saturday, August 28, 2010

प्रवाह 

जलमग्न होती धरा और डूबती मनुष्य काया 
सेकड़ो घर ले समेटे काल बन संकट है छाया
आंसूओ की क्या कमी थी 
जल का यह सागर बहाया 
या सचमुच मनुष्य ने प्रकृति  को इतना रुलाया

तीव्र विस्तार से   जल  की धारा जो चली 
लग रहा मानो भोगोलिक सीमाएं सारी घुल चली  
एक है दुनिया हमारी 
अस्तित्व अपना एक है 
आओ मिटाये दूरिया यह मनुष्य अभी शेष है 




 









Saturday, August 14, 2010

सजती सभा स्वाधीनता
सम्राट सा सम्मान है
सम्पूर्ण सृष्टि सार सरिता
सज रहा सुरधाम है
स्वतंत्र स्वयंभू स्वराज्य का
हो रहा उदघोष  है
लहरा रहा  तिरंगा
हर साँस में अब जोश है 

Saturday, July 31, 2010

स्वप्न 

चल देते है कभी
अचानक से
अनजानी राहों पर 
मंजिलो की तलाश में
समझते है 
कभी समझाते है
या कभी शायद समझ कर भी 
बहक जाते है 
टकराते है टूटते है 
उम्मीदों  से झूझते है 
बहता है मन 
मानो कटी पतंग 
चंचलता बढती है
लहरों की तरह 
कुछ तासीर ही ऐसी है 
या ख्वाबो  का करिश्मा 
जीनी है वो दुनिया
जो में बुनता रहा हूँ 
बीत चला अरसा 
क्यों चुप में खड़ा हूँ 
यह शोर है कैसा 
कैसी है हलचले 
यह ख्वाब है बीता 
या स्वप्न भवर है
टिक टिक घडी की 
निरंतर चल रही 
चंद निगाहे 
बस लक्ष्य तक रही 
उम्मीद है रचेंगे 
इक नया फ़साना 
हो स्वप्न ही भला 
यह  कर है जाना 









Sunday, July 25, 2010

अवसरों को ढूढना 
करना बहाना प्यार का 
बीत जाएगी बहार 
खो न जाना यार 

फिर बजे जो बांसुरी 
ताल छेड़े जो मृदंग 
सोचना है सामने 
फिर वही संसार 

देख मेघराज को 
खिलने लगे जो मन मयूर 
करना नियंत्रित कामना 
है चंचलता पाश 

बारिशो की बूँद को 
गिरने न देना ओष्ठ  पर 
छल जायगी घटा 
वियोगी बयार 

में यहाँ सुदूर में 
शांत छंद रच रहा 
मेरी कवित्व साधना 
है तेरा इंतज़ार

आदित्य ने आभा को पिघला आज है बरसा दिया
ग्रीष्म ने भी शीर्ष पर रहने को है तय  किया 
जीवन लगा पिघलने स्वेद की बूदो तले
वाष्प बन धरा का सारा नीर भी जाता रहा

चल रही पवन भी आज पूरे जोर शोर से
बरसा रही अनल की धार आसमा के छोर से
तपती तपस्या जून की है इन्द्र ने भी सुन रखी
लापता है मेघराज बढती घटा रविन्द्र की

धार जमुना की गई सिकुड़  सर्प रेख सी 
व्याकुल हुई धरा तकती  राह मेघ की
आ चला आषाण लेकिन ताप तेवर तीव्र है
जीवन गया सिमट चढ़ा  प्रदूषण की भेट है 



Thursday, July 22, 2010

में अभी तक सोचता था
हूँ अनाड़ी में यहाँ
आज वह  बतला गया
यह  बस मेरा नजरिया था
चंद पत्थरो  को तराशा 
नूर  का दर्जा मिला 
और कोई  खंडहरों  में ताउम्र भटकता फिरा
.................
जिन्दगी की जंग में बस जीतना ही नहीं 
सेकड़ो नै हार  कर भी नाम है रोशन किया

Saturday, June 26, 2010

समर 

यह  समर मिलन है  सीमा  का
हर घाव यहाँ  धुलते हैं
जब रक्त यहाँ बहता हैं
माटी से रिसता हैं
जाता हैं उस पार वहा
जहा एक वीर है और ढहा
माटी करवाती आलिंगन
चूमा करती हर कण से कण
यह रक्त नहीं आंसू है
जो धरती आज है रोती
खोये है दो वीर पुत्र
कैसे खुश हो सकती
फिर जस्न मना यह कैसा
यह कौन बजाये तुरही
यह किसने खीची  सीमा
यह किसकी संसोधित संधि
बेवफा 

शायर क्या है वफ़ा
यह मौत सिखा जाती है
दो कदम बहुत ज्यादा है
पल भर में ले जाती है
वो तो हँसते थे चलते थे
यह चुपके से आती है
वो जाने पहचाने थे
यह अनजानी ले जाती है
हम सफ़र कहो या दीवाना
यह वफ़ा निभाती है
आती है ले जाती है
 मझधार में न तड़पाती है
है इश्क मुझे हर पल से
दिल तक जब रहता है
सोचा जो इसने  पल भर
मतलबी बना कहता है
 हम बड़े हैं शायर कलम हमारी
वो बेवफा नारी
जो थी जानी पहचानी
और यह मौत मिली अनजानी

Wednesday, June 23, 2010

बिखरते रंग देखे थे ज़माने में
अब अँधेरे है आशियाने में
दीवारों के परदे भी उलझे हुए
सोचते क्या रह गया छिपाने में
चमकती चांदनी जो पड़ कभी जाती
दिखती दरारे और बने घर उस वीराने में
फिर भी मंजूर नहीं बुझना अभी
सेकड़ो हैं उमंगें इस ज़माने में

Saturday, June 19, 2010

       समर्पण 

उस  क्षण  मुझको विश्राम कहा
आनंद भी हैं अविराम नहीं
सीमा अब तक अपरिभाषित सी 
बिखरी आशा अनजान यही

मुझको उत्तर की चाह  नहीं
मेरे प्रश्नों का मोल यही
जीवन मेरा संग्राम सा हैं
पाने की इसमें आस दबी

कुछ पल गुमसुम ही रहने दो 
 ख़ामोशी तोड़ी जाएगी 
बरसो  से ख्वाब  सजाया है 
तस्वीर  भी  मोड़ी जाएँगी 

अश्रु भी अवसान नहीं 
जीवन भी अंत नहीं होगा 
यह क्रम सदा चलता आया 
मुझसे विचलित न कल होगा 

यही समर्पण पाया था 
मैं यही समर्पण दे जाऊँगा 
मैं आज समर्पित होता हूँ 
कल  यही समर्पण चाहूँगा 

Wednesday, May 19, 2010

मेरे कुछ ख़ास साथियो को समर्पित 

बीत गया धुंधला सा सपना
रात गुजर सी चली गयी 
आने वाले कल की यादे 
फिर माथें में उभर रही 

स्वप्निल स्वरित स्वयंभू काया 
स्वप्नों की यह चंचल छाया
स्वप्न सरोवर सुधा प्रवाहित 
आज सृजन  को उभर रही 

छोड़ चला  मैं आज स्वयं को 
स्वप्न नया एक पाने को 
कदम उठाये आज है मैंने 
दुर्गम पथ अपनाने को



Sunday, April 04, 2010

सीमा

जब बारिश की बूंदो ने भी हमसे नाता तोड़ लिया
 खेतो की हरियाली ने भी गाँव का दामन  छोड़ दिया 
सुनकर आया तेरे दर पर खुशियो की बारिश होती है
नहीं पता था आंसू बहते और नुमाइश होती है

आज तुम्हारे शहर मैं आकर  मैं खुदको ही भूल गया 
नहीं पता किस राह चला था और किधर मैं निकल गया 

अपनी मिट्टी पर जब हम अनजाने चेहरे पाते थे 
उन चेहरों मैं भी जाने कैसे अपनापन खोज ही लाते थे
आज सेकड़ो चेहरो में , मैं खुद को खोया सा पाता हूँ 
बस   फुटपाथो पर बिखरी भूखी  लाशे गिनता जाता हूँ 

नही जानता क्यो फिर भी वो गीत खुशी के गाते हैं
क्या वो इतने सीमित है या हम सीमा से बाहर आ जाते हैं