Saturday, February 26, 2011

दोहे 

अपराधी कितने बड़े, लूटत गए सरकार
निर्देशक बेदाग़ बने , कहे चमचे जिम्मेदार 

दागी सारा जग हुआ, छाया भ्रस्टाचार
लूट रहे है भाग सब , जनता है लाचार 



एक एक कर बढता है
वह मील का पत्थर
अंतिम सफर तक चलता  है
वह मील का पत्थर
बनता  गवाह  हर  कारवा  का
वह मील का पत्थर
मूर्त  है फिर  भी है जीता 
वह मील का पत्थर
सेकड़ो को राहे बताता 
वह मील का पत्थर


कल से कल  को है मिलाता
वह मील का पत्थर
गाव से शहरो  को जाता
वह मील का पत्थर
भटको  को मंजिल  दिखाता
वह मील का पत्थर
नन्हा है लेकिन बड़ा है
वह मील का पत्थर
आज भी गुमसुम खड़ा है
वह मील का पत्थर



Saturday, February 19, 2011

क्रिकेट का बुखार आजकल सातवे आसमान पर है. हो भी क्यो न विश्व कप जो शुरू हो गया है. है भी तो किसी  कुम्भ के मेले से कम नहीं, अगर नहीं मिला तो अगला मौका पूरे चार साल बाद ही मिल पायेगा. वैसे भी चार चार साल करके २८ साल तो गुजार ही दिए. सचिन विश्व के सारे कीर्तिमान कायम कर चुका, बस विश्व कप ही देखना रह गया है. उम्मीद है हम बेहतर प्रदर्शन ही करेंगे.  

Friday, February 18, 2011

दो डग चले थे बिखरे नैना 
अंखिया बरसी तरसे चैना
राग रहित अपनी फुलवारी 
कैसे बोलो ला दे गहना   
कही व्यसन की बाढ़ लगी है 
पागल पंथी प्यासा भटके 
कही सजी है रूप की ज्वाला
विद्वतत्व परिचय को तरसे
उठी अनल सी धरा की सीमा 
बादल बन कर रही बरसती 
श्याम रंग ही हुआ सत्य अब 
जीवन की परिभाषा सस्ती 
सोचे व्यर्थ चला मैं कितना
मेरी कलम से निकला अक्षर
भला व्योम सा मेरा जीवन
नहीं यहाँ कुछ शून्य से बढकर

Monday, February 07, 2011

नन्हे से कद का शिल्पकार
 रचता  सुनियोजित जाल विशाल
है मुक्त सभी सीमाओ से
उसकी तकनीको का आधार
मुख से झरता एक श्वेत   बाल
कदमो से सूत्रित बन  विशाल
संकेतक है इस प्रवृत्ति  का
है धेर्य ही संरचना का आधार


Saturday, January 08, 2011

एक पेड़ का पत्ता
टूटा डाली से जा बिखरा
माँ के आँचल में  जा निखरा
ले चली पवन यह  किस ओर
 कैसा है यह शोर


सपनो का वो बादल
प्यारा सा था  वो तरुवर
सूरज की किरणो ने बेधा
मेरे अन्तर्मन का शोर  
ले चली पवन यह किस ओर

उठती है सपनो की लहरें
गिरते है संशय   के परदे
तूफा की धारा में बहकर
तय करने है मीलो के पहरे
ले चली पवन यह किस ओर

अंधियारे की बस्ती
मिटती नहीं मिटाये हस्ती
जीवन के अनमोल क्षणॊ को देकर
पाए है शब्दो के मोल
ले चली पवन यह किस ओर

Friday, December 31, 2010

पलको से ओझल होने को अब  चार कदम ही बाकी है
ढलने वाली है रात अभी
एक  नयी सुबह की  तैय्यारी है
उधडे से कपड़ो में बीता
यह साल रहा घोटालो  का
किसने किसको कितना लूटा
बिखरे संदेशो के हवाले का
न्याय क्षेत्र  भी शक की संज्ञा से बच न पाए यहाँ
लूटमार के अंतर्द्वद में विलुप्त हुआ है सत्य यहाँ
अर्थजगत की तस्वीरो में मेरा भारत उभरा है
खेलजगत की भूमि में  एक नया पेज सा निखरा हैं
आज विश्व की सर्वशक्तिया भारत में आकर टिकती है
अपने बाजारो  के दम पर उनकी अर्थव्यवस्था सुधरती हैं
बन स्वतंत्र ओर न्यायपूर्ण नीति से चलते जायेगे
उम्मीद हैं आने वाले कल  में विकसित भारत बन जायेगे
इससे पहले मेरे क्रम में एक नया वर्ष जुड़ पाए
धन्यवाद करता हूँ सबका
इस  आशा से,
उस कल में हम अपना सर्वत्र परचम लहराये

Saturday, December 25, 2010


कुछ पनघट से लाकर छोड़ा
कुछ अंखियो से पाकर जोड़ा
देख श्याम की राह में व्याकुल
गोपी का जल हुआ न थोडा
डूब गया दिन हुई है रतिया
लौट चली अब सारी सखिया
बोलो मेरे श्याम सलोने
ओर करू  में कितनी बतिया
कही बावरी रात का घूघट
मुझको अपने अंक न ले ले
नटखट हुई चांदनी देखो
अपने सारे भेद न खोले

इन बिखरी आँखो का काजल
अर्धविप्त नयनो   से बोले
बनी  श्याम की राह में व्याकुल
इन नैनो से श्याम न खो दे
चली बावरी पवन भी देखो
मंद सौम्य सी ध्वनि सुनाती  
कही श्याम की बंसी पाकर
मुझ पर तो न रोब जमाती
उठी दिवा सी स्वेत किरण जो
इंदु छवि है मेरे उर की
आलंगन अधिकार अधूरा
आकर्षित अमृत अनुभेरी 

नयन ताकते तेरी सीमा 
निशा चली अब अपने डेरे
देख रवि कि किरण क्षितिज  पर
भंवरो ने भी पंख है खोले 
बनी विरह कि बेधक ज्वाला
उषा का आह्वान कराती
अंधियारे से ढके विश्व को
अपनी लाली से नहलाती
कही श्याम कि चंचल लीला
निशा नीर सी  आई हो 
सम्मुख होकर भी गोपी से 
वह तस्वीर छिपाई हो
उठी सुप्त सी कोई छाया
चली कही वो अपने डेरे
छिपी लालिमा अधर में जाके
यमुनाजल रवि किरणो से खेले

 

क्रमश:
कृते अंकेश

Wednesday, December 22, 2010

प्रश्न


अपनो की हरकतो ने
गैरो का घर बसाया
जो आबो हवा दी थी मैंने
उसमे जहर  मिलाया
 कैसे कहू में सपना
 मेरा कभी न यह था
आज़ादी को मेरी
बंधन बनाया उसने
बिखरे  हजारो रंगो में
में रंग बस यह भूला
मेरी सदी का सपना
पल में भुलाया उसने  
कैसे बताऊ उनको
तुम भी हो मेरे अपने
उन अपने ही शब्दो  ने
जिन्दा जलाया मुझको

Tuesday, December 14, 2010

अखबारो की सुर्खियो में
कोई भ्रष्ट नेता न पाया
 जाग चुका या अभी स्वप्न है
 यह कैसा कलयुग है आया
समाचार की भाषा में अब
भ्रस्टाचार  पर्याय बन गया
जीवन की परिभाषा में
सत्य न्याय कही दूर छिप गया
आनंदित असुरो की सेना 
अपने कर्मो का न्याय  तोलती
संविधान को रखे ताक पर
स्वाभिमान से सदा बोलती
राज्य हमारे पितृ  सौप गए
 बच्चे को राजा बनवायेगे
 जनता का क्या वो जी लेगी
हम देश  बेच कर खायेगे 

Friday, December 03, 2010

स्मृति

अधूरी सी रही  जो ख्वाइश कभी 
वो आज जीने की ख्वाइश हुई
छिपे रंग बीते समय के तले
तस्वीरो को रंगी बनाने की ख्वाइश हुई

ढूँढो  बीता समय वो गुजरा सा कल
कहा बिखरे वो चंचल से पल
वो तेरी हसी अधूरी पज़ल
में भूला बेरंग मौसम की ग़ज़ल

तराशे से मोती वो साथी पुराने
नुक्कड़ की मस्ती कई अफसाने
अधूरी सी ख्वाइश अधूरी सी हस्ती
हकीकत की दुनिया में सपनो की बस्ती

चले संग बहते समय के तराने
किस मोड़ मिलते यहाँ कौन जाने
ख्वाइश ही संजोये चले जा रहे है
अधूरे से सपने पले जा रहे है

Thursday, November 25, 2010

पलको को आराम कहा
सारी रातें   वो जगती है
जब किरण भोर की आती है
थकती सी अखियो पर गिरती है


बैचैन बनी बावरी सी
बस तस्वीरो को तकती  है
बिखरी सी रातो में खोयी
यादो में डूबी ठगती  हैं 



अनजान बने दुनिया सारी
नादान बनी यह हसती है
जब किरण भोर की आती है
थकती सी अखियो पर गिरती है

Sunday, November 07, 2010

Humanoid Robo

Use your mind to mould my shape

bring a little brain in its place.

I will tune the problems around 

will make life more profound

I will do whatever you command

I can serve whenever you want 

I will bring your presence everywhere 

I will do whatever you care
 

I will go far in space

I will explore extreme estate 

I will die before you live 

will make sure you have no fear 

I will take tears from you 

I will cry in place of you

Sensing emotions , tuning hearts

together we can resonates the world

Ankesh

Sunday, October 31, 2010

 स्मृति

वो चिर परिचित प्रतिबिम्ब था
फिर क्यो में हैरान हुआ
उन  अधरो का वक्र मुझे
क्यो इतना अनजान लगा

इतनी ख़ामोशी क्यो मेरे
अधरो पर छायी है बैठी
 जीवन के अर्ध शतक बीते
 यह धुंधली घटा छायी कैसी

वह विगत स्वप्न वह विगत घडी
वह विस्मित सी बेचैन बड़ी
वह बारबार व्याकुल करती
वह बेखोफ बड़ी, वह बेखोफ बड़ी

फिर धुंधले से साये में
कुछ परिचित रेखाओ को पाया
पलको को बंद किये बैठा
भूल गया क्या छोड़ आया

कृते अंकेश

Friday, October 08, 2010

स्याह छवि को बना दे उजाला
चिरागो को इतनी फुरसत कहा है

Sunday, October 03, 2010

अभिनव बिंद्रा लिए तिरंगा
मेजबान दल आया है
करतल अभिनन्दन हर्षनाद से
खेल जगत मुस्काया है
विभिन्न विधाए,  भिन्न अदाए
जंग जीत की तैयारी है
सुदूर देश से  भिन्न भेष में
हर्षित यह नर नारी है

Wednesday, September 29, 2010

शब्दो को ताली मिलती है
पर जैबे खाली मिलती है

Tuesday, September 28, 2010

नन्ही सी आँखो में  पानी भरते देखा हैं
भरी दुपहरी में जीवन को नादानी करते देखा है
चोराहे पर पलता जीवन
कितना आगे जायेगा
बचपन का यह सौम्य पत्र कितने शीत शिशिर  सह पायेगा
रोटी के आगे जीवन से बेईमानी करते देखा है
नन्ही सी आँखो में  पानी भरते देखा हैं

कृते अंकेश

Tuesday, September 21, 2010

 जब चिड़िया चुग गयी खेत

.बारिश होते होते काफी देर हो चुकी थी .....कहने को तो शाम के सात ही बजे थे, लेकिन लग रहा था मानो रात की बेला भी ढलने को आ गयी हो . पापा भी कितनी बार बोले थे बेटा कल  चले जाना ..... आज मौसम कुछ ठीक नहीं है. पर जवान जोश के आगे उम्र का रौब कहा टिकता है.  हम भी डट कर बोले, कोई लड़की थोड़े ही है, जो कोई उठा कर ले जायेगा ....... अब भुगतो, उठाने का तो पता नहीं, लेकिन  अगर बारिश न रुकी तो यह  पानी तो पक्का हमें  बहा कर  ही छोड़ेगा. यहाँ आस पास कोई घर या ठोर ठिकाना भी तो नज़र नहीं आ रहा है . हे  इन्द्र देवता कुछ तो रहम करो, में सारे जीवन आपके उपकारो   को नहीं भूलूंगा  , अरे यहाँ तक की इतनी गारंटी  भी देने को तैयार हू कि मेरी बस्ती में किसी को आपकी गद्दी की और आँख तक उठाने नहीं  दूंगा, भगवन बस यह बारिश रोक लो.  यह क्या, प्रार्थना का असर तो कुछ उल्टा ही मालूम होता है ...... बारिश की तीव्रता समय के साथ  बढती ही जा रही है . छोटे छोटे  गड्डे भी सागर को पछाड़ने के लिए जोर शोर से लगे हुए है, नालियो की सीमा विजयी दल की भाति  परिवर्तित होती जा रही है.  यहाँ तक की कुछ नालिया  तो नयी नवेली दुल्हन की तरह इठलाती हुई चलने लगी है . कचरे की भी आज उड़ कर लगी है , मुफ्त में नदी की  सैर  जो कर रहा है. अब तक सुरक्षित बची मेरी सैन्य  चौकी भी अब बारिश के बहाव का शिकार होने के कगार पर आ गयी. कहा जाता है दुश्मन को अगर तोडना है तो सबसे पहले उसकी जड़ो को तलाशो. एक बार अगर जड़ हाथ में आ गयी, फ़तेह तो खुद बखुद हो जाएगी . काल देवता भी आज समूल विनाश के इरादे से ही आये है. पानी के जोर से मेरे आस पास की मिट्टी भी तेरती हुई सागर से मिलने निकल पड़ी. अब तो अतीत  के चित्र आँखो के सामने से गुजरने लगे. जब में छटवे  दर्जे में था, मुझे तैराकी  सीखने की  बड़ी इच्छा होती थी. लेकिन मन की इच्छाओ को प्रधानता मिलती ही कहा है , कभी साल दो साल में अगर कही जिक्र छिड गया तो याद आ उठता था, वर्ना फिर से यह आशा मन के किसी कौने में दब कर बैठ जाती थी. लेकिन आज वाकई खुद पर अफ़सोस हो रहा है, अगर कभी अपनी इच्छाओ को जरा भी प्रधानता दी होती तो आज जान पर बन आने की नौबत तो नहीं आती. लेकिन अब पछताए क्या होत जब चिड़िया चुग गयी खेत.

Thursday, September 16, 2010

बिखरता हूँ  , बिछुड़ता हू,  बहारो से विसरता हूँ
बना व्याकुल बिना वारि भटकता हूँ तरसता हू
वो बेखुद  सा  बना  बैठा  बरसते बादलो के  बीच
विरह की वेधती ज्वाला सहजता हूँ सहजता हूँ