Thursday, September 18, 2014

अगर आसान ही हो ज़िंदगी, तो क्या मज़ा है जीने में
और भला क्या वो मोहब्बत, जहाँ दर्द मिले न सीने में

कृते अंकेश
कच्चे से धागे है
शाखो से जुड़ते है
लिखते है अपनी कहानी
कैसे शुरू होती
कोई न जाने
यारी हो कितनी पुरानी
लड़ते झगड़ते है
मिलते बिछुड़ते है
बनती सवरती निशानी
बचपन ही सजता
संग यारो में हसता
चाहे हो बीती जवानी

कृते अंकेश
बारात

बारात बस पहुचने ही वाली थी, सारे यार दोस्त जम के नाच रहे थे। पांच मीटर की दूरी एक आध घंटे में तय हो रही थी। बैंड भी अपनी पूरी शोहरत बिखेरने में लगा हुआ था । हुड़दंग अपनी चरम सीमा पर था। गानो की फरमाइशें की जा रही थी और बैंड वाला गायक एक साथ किशोर, रफ़ी, कुमार शानू बना हुआ एक ही सुर में सभी गानो को गाये जा रहा था। लोग इतने बेसुध थे कि कोई अगर मैयत का राग भी छेड़ दे, तो वह उस पर भी नाच दे। शादी के मंडप का दरवाजा अब सामने ही दिख रहा था। उधर की तरफ के कुछ लोग भी नृत्य दर्शन करने आ गए थे। भारतीय बारातो में होने वाला यह नृत्य दर्शन अभिनय की चरम सीमा होता है। नृत्य न जानने वाले भी भरे बाज़ार में असंख्य लोगो के बीच इतने विश्वास नृत्य करे, यह भला मज़ाक थोड़े ही है।

इन सब के बीच मेरी व्याकुलता बढ़ती जा रही थी। माना नृत्य देखकर मुझे भी मजा आता है, मैंने भी कई शादियो में ऐसे ही नृत्य किया है, लेकिन जब खुद पर आती है, तब पता चलता है। आज यह नृत्य देख मुझे ऐसा लगने लगा मानो किसी ने व्यंजनो की दुकान के आगे खड़ा करके हाथ पैर बाँध दिए हो। लेकिन जब आदमी कुछ नहीं कर पाता है, तब वह परोपकारी बनने का प्रयत्न करता है। मैंने भी मान लिया कि दूसरो की ख़ुशी में ही मेरी ख़ुशी है। में भी दोस्तो के नृत्य को देखकर आनंद का अनुभव करने लगा।

गाने एक एक कर बदलते जा रहे थे, लोग नाच नाच कर पसीना हो गए थे, बारात लगभग थम ही गयी थी, घोड़ी भी अब स्थिर होकर नृत्य देख रही थी, कि तभी अचानक गाने की आवाज़ में ब्रेक लग गया। हेलो, टेस्टिंग, - बन, टू ,थ्री, शायद एम्पलीफायर में खराबी आ गयी थी। दोस्त लोग बैंड वाले पर भड़कने लगे, यह क्या बात हुई, अभी तो मूड में आने वाले थे और अभी गाना बंद कर दिया। बैंड वाला तुरंत जाकर वैद्युत उपकरणो को देखने लगा, लेकिन उसकी मनोदशा को देखकर पता चलता था कि उसे कुछ नहीं पता। लड़की के पिताजी भी आ पहुंचे थे और यह भानकर कि कुछ गड़बड़ हुई है, जायजा लेने में लगे हुए थे कि तभी किसी ने बोला, अरे मिंकू तो इलेक्ट्रिकल इंजीनियर है न, उधर घोड़ी पर क्या बैठे हो, इधर आओ और एम्पलीफायर सही करो।एक तो तुम्हारी शादी में फ्री में डांस कर रहे है और तुम मज़ा भी बिना मेहनत के वसूलना चाहते हो।

अभी कुछ देर पहले तक जो निगाहे उस नृत्य मंडली पर थी, वो अचानक से मेरे ऊपर आ टिकी, मरता क्या न करता, में उतरने लगा कि तभी कोई बोला, हाँ हाँ, पता भी तो कर ले कि यह इलेक्ट्रिकल इंजीनियर है भी या नहीं, वरना बाद में पता चला ऐसे ही किसी को अपनी लड़की दे दी। मुझे गुस्सा तो बहुत आया, पर कहते है न, कि समझदारी इसी में है कि गुस्से पर काबू रखो, आखिर शादी तो मेरी ही है न, उनका क्या बिगड़ेगा अगर कुछ उल्टा सीधा हो गया, यह सोचकर में बैंड के उपकरणो की तरफ चलने लगा।

सभी लोग मेरी ओर देख रहे थे, मेरे माता पिता उम्मीदो के साथ, भाई होसला बढ़ाते हुए, पडोसी कपटी मुस्कान के साथ और लड़की के पिता शक भरी निगाहो से। एक तो यह एम्पलीफायर न जाने किस कबाड़ से निकाला हुआ था, किसी पुराने उपकरण को जोड़कर गाने वाली मशीन बना दी और अब मुझे थमाकर बोला जा रहा है, या तो मशीन को पहले जैसा करो वरना बोलो की तुम इंजीनियर नहीं हो और शादी, उसके बारे में तो में सोच ही नहीं पा रहा था।

मैंने वहा तारो को देखना शुरू किया, मैंने बैंड वाले से पूछा, मल्टीमीटर है? वह आश्चर्य से मेरी ओर देखकर बोला, नहीं हम पियानो से ही काम चला लेते है। तभी कोई रिश्तेदार बोला, अरे अब तुम जो है उसी को सही कर दो न, क्या इजूल फिजूल की चीज़े मांगने में लगे हो।

कहते है जब मुसीबत आती है, छप्पर फाड़ के आती है। बीच सड़क पर आपकी क्वालिफिकेशन का परिक्षण आपको ऐसे लोगो को देना है, जिन्हे कुछ ज्ञान नहीं और आपका इंजीनियर होना या न होना बस अब एम्पलीफायर के बापिस बजने तक सीमित है।

मुझे ज्ञान का महत्व पता है लेकिन ज्ञान को प्रमाणित करने का गुर शायद मेरे गुरु मुझे सिखाना भूल गए थे।

तभी अचानक से बूंदाबांदी शुरू हुई और देखते ही देखते बारिश होने लगी। सभी लोग दौड़कर मंडप की ओर जाने लगे। मेरे होने वाले ससुर मुझे चलने का इशारा कर रहे थे। में तो उम्मीद ही छोड़ बैठा था लेकिन लगता है भगवान ने मेरी इज़्ज़त रख ली।

कृते अंकेश।

© सर्वाधिकार सुरक्षित
कुछ उखड़े पंख सही
कुछ बिखरे रंग सही
कुछ ही सांसें काफी है
मन में उम्मीद जो बाकी हैं

कृते अंकेश
तुम्हारी घड़ी में
समय की सुईया कसी हुई है एक केंद्र में
फिर से आ जाता है वही समय बार बार तुम्हारे पास
मेरी घड़ी टूट चुकी है
समय मुक्त बहता है मेरे लिए
में नहीं रो सकता बीते हुए समय के लिए
वह नहीं आएगा लौटकर मेरे पास
मेरा भविष्य मेरे वर्तमान से पूर्णतया मुक्त है
मेरा समय आज़ाद है

कृते अंकेश
मेघ जरा अपनी अखियो को
जल में थोड़ा और उतारो
मन के सारे भेद निकालो
जग को तुम जल से भर डालो

सुबह तुमसे पूछ रही है
रात अधेरी किधर गयी है
लेकर किसका खत यह अधूरा
रवि की किरणें बरस रही हैं

तोड़ कर इन रस्मो की चादर
मन को थोड़ा और उतारो
मेघ जरा अपनी अखियो को
जल में थोड़ा और उतारो

कृते अंकेश
मायूसी तुम्हें किसका इंतजार हैं
चेहरे तुम्हें ओढ़कर बिखरे हुए है
फिर किसके लिए तुम्हारा दिल बेकरार हैं
मेरी मुस्कान तुम्हारी इज्जत करती हैं
इसीलिए यदा कदा वो चेहरे पर सवरती हैं
छोड़कर तुम्हारी संगत अब तो यह काया भी सांस न लिया करती है
लगता हैं जैसे इसको तुमसे ही प्यार हैं
मायूसी सच कहो तुम्हें किसका इंतजार हैं

कृते अंकेश
यु तो मौन भी एक बड़ी स्वीकृति है
विरोध में निहित सांकेतिक प्रवृत्ति है
स्वर लेकिन सजाते है विषय मौन का
वाणी से पिरोते है विस्तार व्योम सा
निकली ध्वनि जो मुख से थी पहली
भाषा वो मेरी है सर्वप्रिय सहेली
अब तन चाहे कितने ही गोते लगाये
मर्म मन का मातृ भाषा में ही आए

कृते अंकेश
प्रियवर मेरा श्रृंगार कहाँ  है
जीने का अधिकार कहाँ  है
नाच रही बस काया मेरी
बोलो इसका सत्कार कहाँ है

मेरा खोया प्यार कहाँ है
खुशियो का संसार कहाँ है
ढूंढ रही है अँखियाँ जिसको
वो जीवन का आधार कहाँ है

प्रियवर मेरा श्रृंगार कहाँ  है

में बावरी बनकर भटकी
जीवन स्थिरता को खोजा
चंचल मन था रहा भटकता
मिला न कोई जिसने रोका

कह दूँ अंतर्मन की पीड़ा
ऐसे पल का व्यापार कहाँ है
रख दूँ अपने मर्म का हीरा
बोलो ऐसा संसार कहाँ है

प्रियवर मेरा श्रृंगार कहाँ  है

कृते अंकेश

Wednesday, July 02, 2014

रात भर जला शहर यू अपनी आग में
ढूंढती थी फिर सुबह क्या बचा है राख में
बनकर हवा थी उड़ गयी, रुप, वैभव और छवि
कोयलों के ढेर में आखो की नमी शायद बची
संभोग मे रत अस्थिया, गिद्दो की चौचो की नौकपर
क्षण में बदला हैं शहर, क्षणभंगुरता को छोड़कर

कृते अंकेश
"पीजा" एक बहुतायत से मिलने वाला एवं आसानी से खाया जा सकने वाला भोज्य पदार्थ है, पीज़ा आलसियो के लिए सर्वोचित भोज्य पदार्थ है, जहा समस्त भोज्य सामग्रियो को एक साथ पका कर दे दिया जाता है ताकि आपको अनुचित प्रयत्न नहीं करने पड़े , वैसे पीज़ा को इसके नाम के अनुरूप पीया नहीं वरन खाया जाता है, यह विरोधाभास इसके विदेशी नाम को यथावत हिंदी भाषा में सम्मिलित करने के कारण हुआ है , वैसे भी इससे खाने वालो को क्या फर्क पड़ता है कि नाम क्या है? और रही बात इसे खाने वालो की, तो आलसी लोग खाने का प्रयत्न कर रहे है, वही काफी है, हालाँकि बहुत से लोग इसे गले से नीचे उतारने के लिए शीत पेय पदार्थो का सहारा लेते है, जिसे देखकर संदेह होता है की कही वह इसके नाम पाश में तो नहीं फस गए है?

अंकेश जैन
Time is like a diode,
which restricts its flow in one direction
but like a real diode,
which however good it is
can allow some current to flow in the reverse direction
Similarly time for some of its entity
however strong they are
can sometime travels back through memories

Ankesh Jain



समय एक डायोड की तरह है
जो केवल एक दिशा में चलता है
पर जैसे एक वास्तविक डायोड में कुछ न कुछ रिवर्स करेंट बहती है
उसी तरह यादें हमें समय की धुरी पर फिर से अतीत में ले जाती है
हालांकि यह कमज़ोर होती है
और कभी कभी ही अपना प्रभाव दिखाती है

कृते अंकेश
गम की हिफाजत करो
यह हुनर बन कर छा जायेगा
पिघल आँसू बहा दोगे जो इसे
यह जीना भी व्यर्थ चला जाएगा

कृते अंकेश
इश्क अगर मुझको तुम तक ले जाये, तो अच्छा है
इश्क़ मगर अश्को में बहकर न आये, तो अच्छा है

कृते अंकेश
If the mountains are the biggest slice on earth's cake
Rivers are the nature's knife cutting its cake
And taking the soils to the plain
So that people can grow their grain
This feat is enjoyed by all
Sharing is a joy afterall

Ankesh
घनन घनन घिर घुमड़ घुमड़ घर घाट घने घुमड़त घुमड़त
बदरा बदलो बदकिस्मत, बेहकत बैचैन बना बालक बरवस
पवन प्यार पाती पत्तर, पत्तो पर पड़ता पानी पट पट
झड़ झंझावत झाड़ी झुरमुट झड़ झील झड़त झटपट झटपट

कृते अंकेश
कभी उलझकर मुझमे, कभी बिखरकर मेरे बिस्तर पर
कभी समेटकर मेरी पहचान को खुद में
मेरी आत्मा का निशान हो तुम
मेरे तन के प्रेमी ओ मेरे कपडे
मेरी भी जान हो तुम
तुमने ही जाना है मुझको
इतनी नजदीकी से
बिखरे हो तुम आकर मुझ पर
जब बिखरा में जिंदगी से
भूल थी मेरी जो ठुकराया तुमको
फिर भी तुमने अपनाया
झूमे थे तुम साथ ख़ुशी में
दुःख में आ अपनी बाहो में छिपाया
तुझ में छिपकर ही अब मेरी पहचान यहाँ है
ओ प्रिय नग्न मेरी देह तुझ बिन
इसका अभिमान कहा है

कृते अंकेश
हर बीता हुआ पल कुछ कह देता है
और छूटा हुआ प्रेम भय देता है
सपने अक्सर उलझते है, टूटते है
छूटते है रूठते है
रूठे हुए सपनो को जग सह लेता है
लेकिन छूटा हुआ प्रेम भय देता है
संगीत के तरानो पर
समय के फसानो पर
दोस्ती के अफसानो पर
मन अपनी उलझनो को कह देता है
लेकिन छूटा हुआ प्रेम भय देता है

कृते अंकेश
कविता लयबध्द हो
जरूरी नहीं तोड़कर बढ़ सकती है अक्षरो एवं मात्राओ की गिनती
एक विषय पर ही रहे जरूरी नहीं
बदल सकती है अचानक
जैसे प्रेमिका का इंतज़ार करता प्रेमी कल्पना करता है
उसके आने की, न आने की
यह कल्पना ही उसकी कविता है
बीतता हुआ समय उसके शब्द है
विश्व एक मंच और आते जाते लोग श्रोतागण
कविता तो स्वरो की साधना है
प्रार्थना है यह लेखक की
पूजा है कवि की
है कुछ अक्षरो का क्रम उसके लिए
जिसने नहीं जानी कभी इसकी हस्ती

कृते अंकेश