बारिश भिंगोती रही
वो भीगती रही मुझसे होकर
में भींगता रहा उसके साथ एक छाते के नीचे
बूंदे स्मृति बन सिमटती रही हमारे मध्य
मिटाती रही हमारे बीच की दूरिया
खोलती रही हमारे मध्य के बंधन
जोड़ती रही हमारे मन
बारिश जब रुकी
तो वहा से गए सिर्फ दो बदन
वो भीगती रही मुझसे होकर
में भींगता रहा उसके साथ एक छाते के नीचे
बूंदे स्मृति बन सिमटती रही हमारे मध्य
मिटाती रही हमारे बीच की दूरिया
खोलती रही हमारे मध्य के बंधन
जोड़ती रही हमारे मन
बारिश जब रुकी
तो वहा से गए सिर्फ दो बदन
कृते अंकेश